धर्म - जो प्राणियों को संसार के दुःख से उठाकर उत्तम सुख (मोक्ष) की ओर ले जाए, उसे "धर्म" कहते हैं !

और

"मोक्ष" नाम है इस संसार सागर से पार हो जाने का ... अथवा जन्म-मरण से रहित हो जाने का, सभी कार्यों से निवृत होकर 'कृत्कृत्यता' पा लेने का !

जैन धर्म - वीतराग/सर्वज्ञ/हितोपदेशी भगवान द्वारा ...

आज के समय में सभी जीव वर्तमान पर्याय को ही अपना स्वरुप मान कर तन-मन-धन से इस पर्यात मात्र में श्रेष्ठ से श्रेष्ठ पद पाने में लगे हुए हैं ... जबकि यहाँ से तो नियम से जाना ही है ...
अपितु यही मात्र पर्याय ऐसी है कि जिसमें अपना उद्धार कर सकते हैं हम ...

कुछ लोग हैं, जो स्वाध्याय करने का भाव तो रखते हैं पर सीमित साधन-संसाधनों के चलते कर नहीं पाते !

उन्ही जीवों के लिए "जैन सार" की शुरुवात की गयी है !

इस "जम्बूद्वीप" के "भरत क्षेत्र" सम्बन्धी 'भगवान् श्री वृषभनाथ स्वामी जी' को आदि लेकर 'भगवान् श्री महावीर स्वामी जी' रूप वर्तमान चौबीसी के विषय में अति-संक्षिप्त विवरण यहाँ लिख रहे हैं ...

वर्तमान समय में समयाभाव के चलते हम में से अधिकांश लोग स्वाध्याय नहीं करते हैं, इसलिए क्रियाओं को करते हुए भी हमे सही-गलत का पता नहीं होता ...
धर्म-क्षेत्र में विपरीत श्रद्धान ...

बड़े ही दुःख की बात है कि, आज हमे/हमारे बच्चों को पश्चिमी संस्कृति के तो सभी त्यौहार पता हैं और हम उन्हें मानते भी हैं, किन्तु हमारे जैन पर्व भी हैं, उनमे से काफी के तो हमने नाम भी नहीं सुने, जिनके सुने भी हैं, उन्हें भी हम विपरीत रूप ही मानते हैं ...
यहाँ, इस श्रेणी, "जैन-पर्व - कौनसे और क्यों" में कुछ महत्वपूर्ण जैन-पर्वों के विषय में आगमानुसार लिख रहे हैं, सो हम सभी पढ़ें और अपने जैन पर्वों को हर्षोल्लास के साथ मानना शुरू करें !
यही भाव है ...

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हमारे पूर्व प्रबुद्ध ज्ञानीजन जैसे मनोहर वर्णीजी, पं.दौलत राम जी, पं.भूधर दास जी इत्यादि हम पर बड़ा उपकार करके गए हैं ...
अपने जीवन पर्यन्त किये हुए स्वाध्याय को उन्होंने हमारे लिए बहुत ही सरल शब्दों में छोटे-छोटे भजन, कोटेशन, वचन रूप कह दिया है ...

इनके यह शब्द "अमृत-तुल्य" ही हैं !
आइये इन छोटी-छोटी लाइनों को याद करें और इनका मनन करें !

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