--- जय जिनेन्द्र ---

जो लोग स्वाध्याय करने का भाव तो रखते हैं पर सीमित साधन-संसाधनों के चलते कर नहीं पाते ! उन्ही जीवों के लिए "जैन सार" की शुरुवात की गयी है !

- यहाँ एक-एक शब्द शुद्ध जिनवाणी से ग्रहण कर लिखा गया है !
अपने पास में कुछ भी जोड़ा-हटाया नहीं गया है !
आप पढ़ें और अगर किसी विषय में कोई संदेह हो तो चर्चा हेतु आगे आएं अथवा त्रुटि हो तो संज्ञान में लाने का कष्ट करें !

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