- पहले शादी-विवाह का आयोजन धार्मिक विधिपूर्वक किया जाता था ! किन्तु आज वह सबसे ज्यादा दूषित हुआ है !

- वर्तमान समय में विवाह समारोहों में दिखावे मात्र के लिए जो कार्य किये जा रहे हैं, व किसी भी सभ्य समाज को सुशोभित नहीं करते और जैन समाज में तो वह निंदनीय हैं !
किन्तु आज, समाज के प्रतिष्ठित लोग, उच्च वर्ग के लोग समाज में अपने कद को और ऊँचा करने हेतु जो क्रियाएँ कर रहे हैं, उसे धर्म की दृष्टि तो दूर नैतिकता की दृष्टि से भी अपनाया नहीं जा सकता, लेकिन फिर भी अपनाया जा रहा है उसमे शामिल होकर समर्थन दिया जा रहा है !

हम पढ़ चुके कि रात में जीवों की उत्पत्ति अप्रत्याशित रूप से अनन्तगुणी हो जाती है, ऐसे में इतने बड़े आयोजनों को रात में आयोजित करके उसमे अनंतानंत स्थावर और त्रस जीवों का घात हम अपनी मौज-मस्ती के लिए कर देते हैं !
- प्रीतिभोज :- आपके आगमन तक !
- स्टालों पर लड़के-लड़कियों को खड़ा करना !
- स्टेज पर किराए की लड़कियों से नृत्य करवाना !
- आकाश में आतिशबाज़ी करना !
- बे-हिसाब शोर-शराबे वाले गाजे-बाजे और देर रात तक डीजे !
- बड़े-बड़े होटलों में शादी का आयोजन
याद रखें :-
एक अच्छे होटल में एक अच्छा श्रावक कदापि नहीं दिखेगा !
- हज़ार-लाख-कऱोड रुपयों का व्यय !
- समाज को बुला कर बुफे/स्टाल रूप में भोजन करा कर, नियम से खोटी गति का बंध होता है !

कहीं कहीं तो असमर्थ होने की स्थिति में ऋण लेकर विवाह समारोह सफल किये जाते हैं !
- कुन्तलों में फूलों की सजावट !
- घास के लॉन/गार्डनों में आयोजन !
- घर की महिलाओं का सड़क और समाज के सामने नृत्य !
- देर रात पारिग्रहण-संस्कार/फेरों में हवन/पूजन होना !
- रात में केक इत्यादि काटे जाना !
- हम तो मूक-बधिर और अपंग से हो चुके किन्तु समझ तो उन पंडितों और गुणीजनों का नहीं आता जो सब सही-गलत समझते हुए भी ऐसे अवसरों पर उपस्थित हो कर अपना संसार-वर्धन करते हैं !

- किसी कार्य को खुद न करके उसकी अनुमोदना करने में भी महान दोष है ! रात्रि-विवाह करना या उसमे शामिल मात्र होने से महान पाप का बंध होता है !

जैन धर्मानुनयायिओं को इन सभी क्रियाओं पर अवश्य ही अपना रुख कड़ा कर लेना चाहिए !

अगर आप दृढ हैं, तो बस २ बातें स्वयं से कहनी हैं :-
१ - मैं स्वयं रात्रि में विवाह आयोजन करूँगा नहीं !
२ - कोई अन्य करेगा तो शामिल होऊंगा नहीं !

मात्र कुछ घंटों के आनंद के लिए हम हज़ारों-लाखों वर्षों तक के भयंकर दुःख बाँध रहे हैं !
- ये क्रियाएँ ऐसी हैं की जिनके बारे में "अगर पता होता तो मैं नहीं करता" !
तो अब जब पता चल चुका है ! तो इनसे मुख मोड़ना ही धर्म है !

- जैन विवाह पद्धति के अनुसार, विवाह सम्बन्धी सभी कार्य दिन में ही आयोजित किये जाने चाहिएं !



बाकी विषयों के लिए पढ़ते रहिये "जैनसार, जैन धर्म का सार ... "
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