वर्तमान समय में समयाभाव के चलते हम में से अधिकांश लोग स्वाध्याय नहीं करते हैं, इसलिए क्रियाओं को करते हुए भी हमे सही-गलत का पता नहीं होता ...

धर्म-क्षेत्र में विपरीत श्रद्धान अनंत संसार का कारण है ... काफी सारे विषय ऐसे हैं जिनके बारे में हम गलत श्रद्धान को ग्रहण किये हुए मिथ्यात्व को पुष्ट कर रहे हैं ...

ऐसे ही कुछ अति-आवश्यक प्रश्नों के उत्तर पूर्वाचार्यों के कहे अनुसार ही यहाँ लिख रहे हैं, मन से एक भी शब्द जोड़ना/हटाना/बदलना घोर पाप हैं, ऐसा निश्चित मानते हुए ...

प्र-1 :- जैन धर्म के चालू करने वाले कौनसे भगवान् थे, हमने तो स्कूल में पढ़ा था कि "भगवान् महावीर स्वामी" ने जैन धर्म शुरू किया !


उ :- एक दम गलत, बहुत सी बातों को स्कूल की किताबों में बिना यथार्थ के जाने ही लिख दिया गया है, उन्ही में से एक यह भी है ...

जैन धर्म तो अनादि काल से है ! इसके कोई शुरू करने वाले नहीं हैं !
जिस प्रकार यह संसार अनादि काल से चला आ रहा है, उसी प्रकार जैन धर्म भी अनादि काल से चल रहा है !
भगवान् महावीर स्वामीजी या भगवान् आदिनाथ स्वामी जी इसके चलने वाले नहीं हैं, बल्कि इसका स्वरुप समझाने माने प्रवर्तन करने वाले हुए हैं !

क्यूंकि काल परिवर्तन के साथ साथ बीच बीच में धर्म का लोप हो जाता है, सो समय आने पर तीर्थंकर जन्म लेकर पुनः धर्म का प्रवर्तन किया करते हैं और जीवों को "मोक्ष-मार्ग" का प्रतिपादन किया करते हैं ! इसलिए, ऐसा मानना कि किसी एक भगवान् ने धर्म शुरू किया उस से पहले कभी था ही नहीं जैन धर्म सो "मिथ्य-मान्यता" है, इस से बचना चाहिए !

आइये इस मिथ्या मान्यता का परिहार करें !

प्र-2 :- यह भी पढ़ा स्कूल में ही और टीवी में भी देखा कि रावण को राम ने मारा था ? किन्तु बाद में पता चला कि लक्ष्मण ने रावण का वध किया था ? सच क्या है ?


उ :- समय के साथ और काल के प्रभाव से पुराणों और चरित्रों को पढ़कर कुछ लोगों ने उसमे फेरबदल कर दिए, आगे स्कूलों में, टीवी पर भी उल्टा ही प्रचार किया जाने लगा ... वह सब हिन्दू मान्यता अनुसार है ... जैन मत के अनुसार तो लक्ष्मण ने ही रावण का वध किया था ...

" राम-लक्ष्मण-रावण क्रम से बलदेव-नारायण व प्रति-नारायण" हुए हैं, और यह नियम है कि नारायण के द्वारा ही प्रति-नारायण का वध होता है ! इसलिए हम अपने ही धर्मानुसार जो यथार्थ है उसे मानें !

आइये इस मिथ्या मान्यता का परिहार करें !

प्र-3 :- जैन तो क्या रावण भी राक्षस नहीं ?


उ :- देखिये, "मेघवाहन" नामक विद्याधर को राक्षसोँ (व्यंतर जाति के देव) के इंद्र भीम और सुभीम ने भगवान श्री अजीत नाथ के समवशरण मेँ प्रसन्न होकर राक्षस दीप मेँ लंका नाम का राज्य किया था और राक्षसी विद्या भी प्रदान की थी !
इसी मेघवाहन की संतान परंपरा मेँ एक "राक्षस" नाम का राजा हुआ है उसी के नाम पर इस वंश का नाम राक्षस-वंश प्रसिद्ध हुआ !
मेघवाहन की संतान परंपरा करोड़ों साल तक क्रम पूर्वक चलती रही और और उसमे अनेक करोड़ विद्याधर उत्पन्न हुए "रावण" इसी राक्षसवंश का था !
उनके राक्षसवंश को न जानते हुए उन्हें ही राक्षस मानने लगे जोकि गलत है !

अरे रावण तो प्रति-नारायण" थे !

रावण, मेघनाद, कुम्भकर्ण, विभीषण इत्यादि सभी जीव राक्षस नहीं बल्कि मोक्ष को प्राप्त कर चुके हैं या शीघ्र ही करने वाले हैं !
इनका का जीव तो अनेकोँ भव के बाद भरत क्षेत्र मेँ तीर्थंकर होगा !

आइये इस मिथ्या मान्यता का परिहार करें !

प्र-4 :- महाभारत में द्रौपदी को पांच-पांडवों की पत्नी दिखाया है, तो क्या रामायण की तरह टीवी वाली महाभारत में भी कुछ गलत है क्या ?


उ :- माकन्दी नाम की एक नगरी थी जिसके राजा द्रुपद थे, उनकी रानी का नाम भोगवती था ... उनकी पुत्री थी "द्रौपदी" ..
उनका विवाह करने के लिए राजा द्रुपद ने स्वयंवर रखा ... जिसमे "गाण्डीव" नामक धनुष को वार की परीक्षा का साधन रखा गया ! घोषणा की गयी कि 'जो भी कोई उस अत्यंत भयंकर गाण्डीव धनुष को गोल करने एवं चन्द्रकवेध में समर्थ होगा" वही द्रौपदी का पति होगा ! यह घोषणा सुनकर सभी अति-बलशाली राजागण उस धनुष के चारों ओर गोलाकार रूप में खड़े हो गए, किन्तु देवों के द्वारा अधिष्ठित उस धनुष को छूना और खींचना तो दूर उसे देख पाना भी मुश्किल था ... सबने प्रयास किया फिर "अर्जुन" ने उस धनुष को चुकार ऐसा खींचा कि सब देखते रह गए, अर्जुन ने धनुष खींच कर उस पर डोरी चढ़ाई और उसका आस्फालन किया !

उसी समय "द्रौपदी" ने "अर्जुन" के गले में सुन्दर माला डाल दी ! उस समय वहां जोरदार वायु चल रही थी तो वह माला टूटकर पांचों पांडवों के शरीर पर जा गिरी ! इसिलए किसी "विवेकहीन" चपल मनुष्य ने ज़ोर-ज़ोर से कहना शुरू किया कि "इसने पांच कुमारों को वरा है" ... -- द्रौपदी अर्जुन कि पत्नी थी ... उसे युधिष्ठिर और भीम की बहू जैसी तथा सहदेव और नकुल माता जैसी मानते थे ! यही सच है !

हम सभी याद रखें :- जो अत्यंत शुद्ध आचार के धारक मनुष्यों की निंदा करते हैं उनके उस निंदा से उत्त्पन्न हुए पाप का निवारण कोई नहीं कर सकता ! दूसरे में विद्यमान दोष के कथन करना भी पाप का कारण है फिर अविद्यमान दोष के कथन करने की तो बात ही क्या है ?

महापुरुषों की श्रेणी में स्थित पांच श्रेष्ठ पांडव तो लोक में प्रसिद्ध हैं उनके प्रति मित्या-वचन और कथा करने और सुनने वालों को निश्चय ही पाप का फल भोगना पड़ता है ! इसलिए हम सभी असत्यरूप से कही हुई, मन-गढंत भ्रमित-कहानी-किस्से रूप बातों को छोड़ें और सत्य को जानकार उसे ही स्मरण रखें !

आइये इस मिथ्या मान्यता का परिहार करें !

प्र-5 :- आत्माएं भटकती हैं क्या ?


उ :- नहीँ आत्मा भटकती नहीँ है मृत्यु होने के बाद आत्मा अधिक से अधिक 4 समय मेँ अपने अगले शरीर मेँ प्रवेश कर जाती है यह नियम है और 4 समय अत्यंत कम समय है पता नहीँ चलता इसलिए यह नियम मानना चाहिए कि आत्मा भटकती नहीँ है !

आइये इस मिथ्या मान्यता का परिहार करें !

प्र-6 :- यदि आत्मा नहीँ भटकती है तो फिर भूत पिशाच राक्षस कौन होते हैँ जो हम देखते हैँ लोग बहुत परेशान करते हैँ ?


उ :- यह भूत राक्षस पिशाच इत्यादि व्यंतर जाति के देव हुआ करते हैँ यह शरीर सहित होते हैँ इसलिए इन्हे भटकती आत्मा या कहिए बिना शरीर वाली आत्मा नहीँ मान सकते !
यह व्यंतर देव क्रीड़ा करने मेँ बहुत प्रचुर होते हैँ यही लोग दूसरे लोगोँ को परेशान करते देखे जाते हैँ किंतु क्या ये मुझे भी परेशान करेंगे या सभी को परेशान करेंगे तो ऐसा नहीँ है !
यह देव सिर्फ जिसका उदय वैसा होगा उसकी होनहार में निम्मित मात्र बन सकते हैं, यह भूत पिशाच अपनी तरफ से किसी का भी अच्छा या बुरा नहीँ कर सकते उसका जब तक उसका ऐसा ना हो यह सब मात्र निमित्त बन सकते हैँ !
यह भी मेरा उदय खराब होगा तो ये निम्मित बन सकते हैं, किन्तु यदि मेरा सत्ता का उदय है तो एक नहीं सारे देव भी मिलकर भी मेरा बाल बांका नहीँ कर सकते !

इस जीव का कोई अच्छा बुरा नहीँ कर सकता न हीँ कोई उपकार या अपकार कर सकता है यह जीव केवल अपने द्वारा किए हुए शुभ अशुभ कर्मोँ के फल को भोगता है !
भक्ति पूर्वक पूजा करने से यदि यह देव कुछ देने लगे तो फिर दान पूजा शील सयम ध्यान स्वाध्याय और तप रूप समस्त शुभ क्रिया कार्य कोई क्योँ करेगा ?

यदि भक्ति पूर्वक पूजा अर्चना करने से वंदना करने से खुद ही संसार के कार्य सिद्धि करने लगेंगे तो फिर कर्म सिद्धांत का लोप ही हो जाएगा !

हम शास्त्रोँ मेँ पढ़ते हैँ कि राम चंद्र और लक्ष्मण के विनाश के लिए रावण ने बहुरूपिणी विद्या सिद्ध की थी, पांडवोँ का नाश करने के लिए कौरव लोगोँ ने कात्यायनी विद्या तथा श्रीकृष्ण का नाश करने के लिए कंस ने बहुत सी विद्याओं की आराधना की थी परंतु हम सभी जानते हैँ कि उन विद्याओं से रामचंद्र, पांडव और श्री कृष्ण का कुछ भी अनिष्ट नहीँ हुआ बल्कि श्री रामचंद्र आदि ने मिथ्यादेव की आराधना नहीँ की तो भी निर्मल सम्यक् दर्शन के फलस्वरुप के सभी विघ्न दूर हो गए !

यहाँ स्पष्ट हो जाता है कि किसी देव की कोई ताकत नहीँ कि किसी अन्य जीव का भला बुरा कर सकेँ क्योंकि अपना भला बुरा अपने भले बुरे परिणाम से होता है !

सो, हम इस भय और मिथ्या मान्यता का परिहार करें !

प्र-7 :- किन्तु देव तो सिर्फ स्वर्गों मेँ रहते हैँ न ???


उ :- सुनने मेँ तो लगता है कि देव और स्वर्ग आपस मेँ संबंधित है किंतु जिन शास्त्र को पढ़ने पर पता चलता है कि देव लोग सिर्फ स्वर्ग मेँ ही नहीँ अपितु तीनों ही लोक मेँ निवास करते हैँ !

अधोलोक मेँ व्यंतर और भवनवासी जाति के देव;
मध्य लोक मेँ व्यंतर और ज्योतिष जाति के देव; और
उर्ध्वलोक (स्वर्ग) मेँ वैमानिक जाति के देव का निवास स्थान है !
इसलिए यह कहना कि देव लोग सिर्फ स्वर्ग मेँ ही है सो, ठीक नहीँ है !

आइये इस मिथ्या मान्यता का परिहार करें !

बाकी विषयों के लिए पढ़ते रहिये "जैनसार, जैन धर्म का सार ... "

--- ---