- इस वेबसाइट को सिर्फ और सिर्फ एक उदेश्य से बनाया गया है कि "लोग जैन धर्म की मूल बातें और शिक्षाओं को जानें..."

इसके निर्माण के पीछे प्रचार और नाम का कोई खेल नहीं ...

- आज के वर्तमान समय में पैसा प्रधान हो चुका, धन को अर्जित करना ही एकमात्र लक्ष्य रह गया है !
जबकि सारे पापों का मूल यह "पैसा" ही है !


एक ओर जहाँ पहले जहाँ जीवन यापन योग्य धन-सामिग्री ही जुटाने का प्रयास रहता था और बाकी समय धर्म को दिया जाता था, अब ऐसा नहीं होता !
पहले के समय में मंदिरों-घरों में सुबह-शाम धार्मिक-शिक्षाएं दी जाती थीं !
पूजन-अभिषेक-शिविर-धर्म-चर्चाएं आयोजित की जाती थी, वह सब आज प्राय: लुप्त ही हो चुका है !


हम स्वयं से जितना छल करते हैं, उतना तो अपने शत्रु से भी नहीं करते !
अरे ! कितनी बहुमूल्य मनुष्य-पर्याय को भी कौड़ी के भाव आंक अपने आप को छल रहे हैं, इसे यू हीं खो रहे हैं !


याद रखना चाहिए, कि वर्तमान में जैसी हमारी चर्या है, भाव हैं ... हमे यहाँ से मरकर नियम से खोटी गतियों में ही भ्रमण करना है !
कहने का मतलब यह नहीं कि काम-धंधे छोड़ कर मंदिरजी में ही बैठ जाएँ !
नहीं ! ऐसा नहीं करना है !
किन्तु फिर भी कम से कम जितना संभव हो

  1. - देव-दर्शन
  2. - पूजा
  3. - दान
  4. - तप
  5. - गुरुपास्ति और
  6. - स्वाध्याय
  7. अवश्य ही करना चाहिए !








- हमे शर्म आनी चाहिए, भीतर अब ग्लानि उत्पन्न होनी ही चाहिए कि हमे "जिनागम" के मूलभूत सिद्धांतों का भी कोई ज्ञान नहीं है !
- जब हमे खुद कुछ नहीं पता तो आने वाली पीढ़ी को क्या धर्म रचेगा ???


- किन्तु कुछ लोग हैं, जो स्वाध्याय करने का भाव तो रखते हैं पर सीमित साधन-संसाधनों के चलते कर नहीं पाते !
उन्ही जीवों के लिए "जैन सार" की शुरुवात की गयी है !


- यहाँ एक-एक शब्द शुद्ध जिनवाणी से ग्रहण कर लिखा गया है !
अपने पास में कुछ भी जोड़ा-हटाया नहीं गया है !
आप पढ़ें और अगर किसी विषय में कोई संदेह हो तो चर्चा हेतु आगे आएं अथवा त्रुटि हो तो संज्ञान में लाने का कष्ट करें !

नोट :- इसकी तुलना जिनवाणी माँ से न करें ! आप इसे जिनवाणी न माने, इसे बस जिनवाणी का अंश मात्र माने !
- हम अत्यंत ही भाग्यशाली हैं कि जैन-कुल में मनुष्य-जन्म मिला है !
और अनंत काल से जो हम चतुर्गति में भटक भयंकर दुःख को भोग रहे हैं, इस संसार से पार पाने का उपाय केवल "जैन-धर्म" में ही बतलाया है !
सो, उसका श्रद्धान करें और अनुसरण करें !!!

याद रखिये :-
- धर्म ही काम आएगा बाकी तो "इस धरा का इस धरा पर सब धरा रह जायेगा" !
यह जैन सार काफी नहीं है, यह तो ज्ञान के महासागर की एक बून्द भी नहीं है !
कृपया इसके साथ साथ आप स्वयं अपना स्वाध्याय करना भी प्रारम्भ करें !


- भवितव्य दुर्निवार है -