कर्म ... पृष्ठ-भूमिका

- हमे ये तो पता ही है कि ... कर्म ही है, जिनके कारण हम संसार में भटक रहे हैं , और अब तक मुक्ति नहीं प्राप्त कर सके ...
अक्सर हमने देखा है कि इस संसार में कोई बहुत अमीर है तो किसी के पास खाने के लिए भी पैसे नहीं है , एक ही माँ के बच्चे हैं, एक पढाई में निपुण उसे एक बार देखते ही सब याद और दूसरा कितना ही पढ़ले फिर भी भूल जाता है ...
सचिन को भारत रत्न क्यूँ, मोदी को इतनी कीर्ति क्यूँ ?
जब हम सभी जीव हैं, सबका मूल रूप समान है तो फिर ये सब क्यूँ ? इसके पीछे कोई कारण तो होना ही चाहिए ... जैन धर्म में इसका कारण "कर्म" को मानते हैं ..

अब कर्मों को समझना है और ये ही सबसे ज्यादा ज़रूरी है ...
अब तक हममें से अधिकाँश को नहीं पता कि कर्म बंधते कैसे हैं, क्या कांसेप्ट है कर्म का ...
कर्मों कि गणित समझने के लिए पहले उससे सम्बंधित कुछ अन्य विषय समझने बेहद ज़रूरी हैं, जैसे :-
पुद्गल
पुद्गल-स्कन्ध
वर्गणा इत्यादि ...

पुद्गल

- कर्म को समझने के लिए पुद्गल समझना ज़रूरी है क्यूंकि, कर्म और कुछ नहीं इस लोक में भरे हुए पुद्गल-स्कंध ही हैं जो कर्म रूप परिवर्तित हो कर आत्मा के प्रदेशों से चिपक जाते हैं ...

यह संसार द्रव्यों से ठसाठस भरा हुआ है, ये 6 द्रव्य जीव और अजीव के भेद से 2 प्रकार के हैं :-
१- जीव द्रव्य :- जिसमे चेतनता हो, जो जीता हो ... जिसने देखने और जानने कि शक्ति हो, उसे जीव कहते हैं ! हमारी आत्मा जीव द्रव्य है !
२- अजीव द्रव्य :- जिसमे चेतना न हो, जो देख और जान न सके ... उसे अजीव द्रव्य कहा है ...

-> अजीव द्रव्य कौन कौन से हैं ?
पुद्गल द्रव्य, धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य, आकाश द्रव्य और काल द्रव्य ...

पुद्गल -> 2 शब्दों से बना है
पुद + गल = पुद्गल ,
पुद माने जुड़ना या मिलना, और
गल माने गलना या बिछुड़ जाना ...

याने जो पदार्थ पूर्ण और गलन स्वभाव वाला है, और जिसका संयोग-वियोग हो सके वो पुद्गल है !
हम जो भी कुछ छूते,चखते,खाते,सूंघते,सुनते और देखते हैं वो सब पुद्गल द्रव्य कि पर्याय होती हैं ...

द्रव्य संग्रह में आचार्य श्री नेमीचंद सिद्धान्तिदेव जी ने पहले अधिकार की 16 गाथा में पुद्गल द्रव्य की दस पर्याय बतायी हैं :-

"सद्दो बंधो सहमो थूलो संठाण भेद तम छाया !
उज्जोदादवसहिया पुग्गलदव्वस पज्जाया !!16!!"

हमारा शरीर पुद्गल पदार्थ है ... बिना आत्मा के संयोग के यह कुछ भी नहीं कर सकता ...

अणु और स्कन्ध

पुद्गल के 2 भेद हैं :-

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१ - अणु पुद्गल :-
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- पुद्गल द्रव्य का सबसे छोटा आकार ...
जिसके टुकड़े नहीं किये जा सकते
जिसका आदि, मध्य और अंत नहीं होता !
विज्ञानी इसे "Atom" बोलते हैं, किन्तु उनके एटम में भी अनेक न्यूट्रॉन,प्रोटोन इत्यादि होते हैं, पर जैन दर्शनानुसार अणु अविभागी है, और इस से छोटा कुछ नहीं !
लोक में पुद्गलाणुओं की संख्या न घटती है और ना ही बढ़ती है, बस अवस्थाएं बदलती रहती हैं !

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२- स्कन्ध पुद्गल :-
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- दो या दो से अधिक पुद्गलाणु के मिलने पर पुद्गल स्कन्ध बनता है,विज्ञान की भाषा में "Molecule" हुआ !
पृथ्वी, जल, छाया, अँधेरा, चांदनी आदि पुद्गल-स्कन्ध के उदाहरण हैं ...
चिकनाई और रूखापन पुद्गल द्रव्य के गुण हैं, और इन्ही के कारण २ या अधिक पुद्गलाणु आपस में बंधकर पुद्गल-स्कन्ध बनाते हैं !

पुद्गल-वर्गणा

हमने पढ़ा की २ या अधिक अणु मिलकर स्कन्ध बना लेते हैं .. उसमे भी अलग अलग प्रकार के पुद्गल-स्कन्ध बनते हैं, तो जो परमाणुओं के योग से सबसे पहले जो सूक्ष्म स्कन्ध बनता है, उसे "वर्गणा" कहते हैं !
याने,
समान गुण वाले परमाणुओं के पिंड को "वर्गणा" कहते हैं !
विज्ञान इसे "Molecule" कहता है , जैन धर्म के हिसाब से वर्गणा पूरे लोक में ठसाठस भरी हुई है !
और इन वर्गणाओं के योग से ही जल, अग्नि, वायु और इस लोक के समस्त दृष्ट पदार्थों का निर्माण हुआ है !

पुद्गल वर्गणा के 23 भेद होते हैं :-
इनमे से सिर्फ 5 वर्गणाएं ही जीव के ग्रहण करने योग्य हैं बाकी अग्रहणीय हैं ...

१- आहार वर्गणा :- इससे औदारिक,वैक्रियक और आहारक शरीर की रचना होती है !

२- तैजस वर्गणा :- इससे तैजस शरीर की रचना होती है (शरीर 5 प्रकार के होते हैं, वो बाद में पढ़ेंगे)

३- भाषा वर्गणा :- इसके द्वारा 4 प्रकार के वचनों की रचना होती है !

४- मनो वर्गणा :- इसके द्वारा ह्रदय स्थान में मन की रचना होती है !

पांचवी और कर्म के हिसाब से सबसे प्रमुख :-

५- कार्मण-वर्गणा :- ये वर्गणा निमित्त पाकर कर्म के रूप में बदल जाती हैं.
इनके द्वारा ही आठ प्रकार के कर्म बंधते हैं !

- बिना निमित्त के ये वर्गणा कर्म में नहीं बदल सकती !
-एक एक जीव के साथ अनंत कार्मण-वर्गणा लगी हुई हैं !

अब ये कार्मण वर्गणाएं कैसे आत्मा से चिपकती हैं और कर्म बन जाती है वो पढ़ेंगे ...

कार्मण-वर्गणा

हमने कार्मण-वर्गणा पढ़ी और ये भी पढ़ा कि :-
- ये वर्गणा निमित्त पाकर कर्म के रूप में बदल जाती हैं.
- इनके द्वारा ही आठ प्रकार के कर्म बंधते हैं !
- बिना निमित्त के ये वर्गणा कर्म में नहीं बदल सकती !
- एक एक जीव के साथ अनंत कार्मण-वर्गणा लगी हुई हैं !

प्र:-कौनसे निमित्त पाकर ये कर्म में बदल जाती हैं ?
:- जीव के मोह, राग, द्वेष रूप परिणामों का निमित्त पाकर !
ये जीव रागादिक भावों से प्रभावित होकर प्रत्येक समय मन-वचन और काय से कुछ न कुछ करता रहता है, और इन क्रियाओं से आत्मा के प्रदेशों में हलन-चलन होने लगता है !

- जिसके कारण लोक में व्याप्त कार्मण-वर्गणा रूप पुद्गल-स्कन्ध कर्म रूप होकर आत्मा के प्रदेशों के साथ सम्बन्ध स्थापित करलेते हैं !

आसान भाषा में कहें तो

"आत्मा के साथ बंधने वाले पुद्गल-स्कंधों को ही कर्म कहते हैं"

और ये भी लिखा है कि बिना निमित्त के कार्मण-वर्गणा कर्म रूप नहीं बन सकती, इसीलिए तो कहते हैं, कि

"जिसने राग द्वेष कामादिक जीते सब जग जान लिए,
सब जीवों को मोक्ष मार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया !!"
माने जिसने राग-द्वेष परिणामों पर विजय पाली वही भगवान् है ... फिर चाहे उसे बुद्ध कहो, वीर कहो, जिन कहो, ब्रह्मा कहो ...

हर जीव के साथ अनंत कर्म बंधे हुए हैं, जो अपना समय आने पर फल देते हैं, और तब तक आत्मा से बंधे रहते हैं ...

कर्म

- जब जीव के राग आदि विकारी भाव होते हैं, तब कार्मण-वर्गणा के परमाणु आत्मा के साथ बंधकर कर्म-रूप हो जाते हैं ! और उनमे स्थिति व फल देने कि शक्ति उत्त्पन्न हो जाती है !

- कर्म बंध होने के समय हमारे जैसे शुभ-अशुभ भाव होते हैं, उन्ही पर कर्मों के प्रभावों का समय और तीव्रता निर्भर करती है !

प्र:- ये कर्म आत्मा के साथ बंध कर करते क्या हैं ???
उ:- ये कर्म आत्मा कि क्षमता पर आवरण(रूकावट/पर्दा) ड़ाल देते हैं, और आत्मा के अनंत गुणों को प्रकट नहीं होने देते !!!

घातिया और अघातिया के भेद से 8 कर्मों को २ वर्गों में बांटा गया है :-
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१- घातिया कर्म :-
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- जो कर्म आत्मा के असली स्वरुप को पूरी तरह से घात करने वाले हैं , वो घातिया कर्म हैं.
ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय और अंतराय !!!

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२- अघातिया कर्म :-
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- जो कर्म आत्मा के गुणों को सीधे घात करने कि शक्ति नहीं रखते, किन्तु घातिया कर्मों के सहायक हैं ! वेदनीय, आयु, नाम और गोत्र कर्म
चार अघातिया कर्मों को नाश करने के बाद ही जीव को मुक्ति प्राप्त होती है !

- अरिहंत भगवान् के चार घातिया कर्म नष्ट होते हैं और सिद्ध भगवान् के आठों कर्म नष्ट हुआ करते हैं ...

कर्म - प्रकर्तियाँ

प्रकृति याने स्वभाव ...
कर्मों के घातिया और अघातिया रूप से 2 भेद हैं, जिनकी दोनों की 4-4 कुल 8 प्रकृतियाँ हैं

और प्रकृति के अपेक्षा से कर्म के इन आठ मूल भेद के उत्तरोत्तर 148 भेद हैं ... और इन्ही प्रकृतियों पर निर्भर करती है किसी कर्म की फलदान शक्ति, कुछ प्रकृतियाँ पुण्य रूपी हैं और कुछ पाप रूपी ...

1 - ज्ञानावरणीय कर्म

- जिस कर्म के उदय से आत्मा के ज्ञान पर आवरण पड़ जाता है, उसे ज्ञानावरणीय कर्म कहते हैं !
केवल पर्दा पड़ता है, आत्मा का ज्ञान नष्ट नहीं होता है ... इस कर्म का क्षय करलेने पर आत्मा अनंत ज्ञान को पा लेती है !

उदाहरण :-
जैसे मूर्ति के ऊपर कपडा ड़ाल दिया, तो वह मूर्ति दिखलायी नहीं देती ...
एक लड़का दिन रात पढ़ाई करता है, कित्नु उसे कुछ भी याद नहीं होता, सो उसके ज्ञानावरणीय कर्म का उदय है !

ज्ञानावरणीय कर्म बंध के कारण :-
किसी के पढ़ने में विघ्न करना, पुस्तकें फाड़ देना, गुरु की निंदा करना, ज्ञानी से ईर्या करना, ज्ञान के प्रचार-प्रसार में बाधा डालना इत्यादि से ज्ञानावरणीय कर्म का बंध होता है !!!

-प्रकृतियाँ:- ज्ञानावरणीय कर्म की 5 प्रकृतियाँ होती हैं
-श्रेणी :- घातिया कर्म
-प्रभाव :- आत्मा के सम्यक ज्ञान पर पर्दा
-इसके नाश होने पर उत्त्पन्न गुण :- अनंत ज्ञान
-उत्कृष्ठ(ज्यादा से ज्यादा) स्थिति :- 30 कोड़ा कोड़ी सागर
-जघन्य(कम से कम) स्थिति :- अन्तर्मुहुर्त

2 - दर्शनावरणीय कर्म

- जिस कर्म के उदय से आत्मा के यथार्थ अवलोकन/दर्शन पर आवरण पड़ जाता है, उसे दर्शनावरणीय कर्म कहते हैं !
केवल पर्दा पड़ता है, आत्मा का दर्शन गुण नष्ट नहीं होता है ... इस कर्म का क्षय करलेने पर आत्मा अनंत दर्शन गुण को पा लेती है !

उदाहरण :-
जैसे किसी बड़े आदमी से मिलने जाना है, किन्तु उसका चौकीदार/दरबान उससे मिलने की अनुमति नहीं देता और दरवाज़े पर ही रोक देता है ...
हम घर से मंदिर जी गए बड़े भाव बना कर,कित्नु देखा तो मंदिरजी के द्वार पर ताला जड़ा हुआ है ... सो ये हमारे दर्शनावरणीय कर्म का उदय है !

दर्शनावरणीय कर्म बंध के कारण :-
किसी के देखने में विघ्न करना, अपनी वास्तु किसी को न दिखाना, अपनी दृष्टि पर गर्व करना, किसी को मंदिर जाने से रोकना, किसी की आँखों को कष्ट पहुचाने इत्यादि से दर्शनावरणीय कर्म का बंध होता है !!!

-प्रकृतियाँ:- दर्शनावरणीय कर्म की 9 प्रकृतियाँ होती हैं
-श्रेणी :- घातिया कर्म
-प्रभाव :- आत्मा के निर्मल दर्शन पर पर्दा
-इसके नाश होने पर उत्त्पन्न गुण :- अनंत दर्शन
-उत्कृष्ठ(ज्यादा से ज्यादा) स्थिति :- 30 कोड़ा कोड़ी सागर
-जघन्य(कम से कम) स्थिति :- अन्तर्मुहुर्त

3 - वेदनीय कर्म

- जिस कर्म के उदय से हम वेदना अर्थात सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, उसे वेदनीय कर्म कहते हैं !
इस कर्म से आत्मा के अव्याबाध गुण अर्थात आकुलता रहित सुख (undisturbed mental peace) का घात होता है ... इस कर्म का क्षय करलेने पर आत्मा अनंत सुख को पा लेती है !

उदाहरण :-
इसका स्वभाव शहद में लिपटी हुई तलवार जैसा है ... शहद लगी तलवार की धार को चाटने से सुख का अनुभव तो होता है, किन्तु आगे जीभ कट जाने पर दुःख का अनुभव भी होता है !

वेदनीय बंध के कारण :-
साता वेदनीय :- जीवों पर दया करना, दान करना, संयम पालना, लोभ नहीं करना, वात्सल्य रखना, वैय्यावृत्ति करना, व्रत पालना, क्षमा भाव रखना आदि शुभ क्रियाओं से !
असाता वेदनीय :- शोक करना, पश्चाताप करना, रोना, मारना, वध करना आदि अशुभ कार्यों से !

-प्रकृतियाँ:- वेदनीय कर्म की 2 प्रकृतियाँ होती हैं, साता वेदनीय और असाता वेदनीय
-श्रेणी :- अघातिया कर्म
-प्रभाव :- सुख-दुःख का अनुभव
-इसके नाश होने पर उत्त्पन्न गुण :- अव्याबाध गुण
-उत्कृष्ठ(ज्यादा से ज्यादा) स्थिति :- 30 कोड़ा कोड़ी सागर
-जघन्य(कम से कम) स्थिति :- 12 मुहुर्त

4 - मोहनीय कर्म

- जिस कर्म के उदय से हम मोह, राग, द्वेष आदि विकार भावों का अनुभव करते हैं, उसे मोहनीय कर्म कहते हैं !
अर्थात, जो कर्म आत्मा के सम्यक्त्व व चारित्र गुणों का घात करता है वो मोहनीय कर्म है !

मोहनीय कर्म का स्वभाव नशीले पदार्थ के सेवन कि तरह है, इसके उदय से यह जीव अपना विवेक खो देता है, उसे हित-अहित का होश नहीं रहता !
काम-क्रोध-माया-लोभ आदि भी मोहनीय कर्म के उदय से ही होते हैं !
इसी कर्म के उदय के कारण श्रीराम जैसे महापुरुष भी लक्ष्मण के मृत शरीर को छह महीने तक अपने कन्धों पर लेकर घूमते रहे !

** यह कर्मों का राजा है ! जैसे राजा के न होने पर उसकी प्रजा असमर्थ याने बेकार हो जाती है, उसी प्रकार मोहनीय कर्म के अभाव में बाकी सारे कर्म अपने कार्य में असमर्थ हो जाते हैं !

मोहनीय कर्म बंध के कारण :-
सच्चे देव-शास्त्र-गुरु को दोष लगाने, मिथ्या देव-शास्त्र-गुरु की प्रशंसा करने, आगम विरुद्ध कार्य करने, क्रोध, लोभ, हिंसा, आदि करने से मोहनीय कर्म का बंध होता है !!!

- सबसे पहले इस मोहनीय कर्म का ही क्षय होता है, उसके बाद बाकी के घातिया और अघातिया कर्मों का क्षय होता है !

-प्रकृतियाँ:- मोहनीय कर्म की 28 प्रकृतियाँ होती हैं,
-श्रेणी :- घातिया कर्म
-प्रभाव :- हित-अहित का विवेक नहीं रहता
-इसके नाश होने पर उत्त्पन्न गुण :- क्षायिक सम्यक्त्व
-उत्कृष्ठ(ज्यादा से ज्यादा) स्थिति :-
70 कोड़ा कोड़ी सागर (दर्शन मोहनीय),
40 कोड़ा कोड़ी सागर (चारित्र मोहनीय)
-जघन्य(कम से कम) स्थिति :- अन्तर्मुहुर्त


5 - आयु कर्म

- जिस कर्म के उदय से जीव किसी एक शरीर में निश्चित समय तक रुका रहता है, उसे आयु कर्म कहते हैं !
अर्थात, किसी शरीर में रुके रहने कि अवधि/समय का नाम आयु कर्म है !

उदाहरण :-
जैसे किसी घोड़े को लोहे कि बेड़ियों से जकड दिया, बाँध दिया , तो वह वहाँ से कहीं जा नहीं सकता, उस तरह से आयु कर्म इस जीव को एक पर्याय/शरीर में बाँध के रखता है !

जैसे हम मनुष्य पर्याय में रुके हुए हैं, आयु कर्म के क्षय होने के बाद हमारी आत्मा इस मनुष्य देह को छोड़ कर अन्य शरीर में चला जायेगा !

किस गति का क्या कारण :-
1 - नरकगति - बहुत ज्यादा आरम्भ(आलोचना पाठ वाला आरम्भ) और बहुत परिग्रह करने से
2 - त्रियंचगति - मायाचारी से
3 - देवगति - स्वभाव की कोमलता, बाल-तप और धर्म करने से
4 - मनुष्यगति - थोडा आरम्भ और थोडा परिग्रह करने से


-प्रकृतियाँ:- आयु कर्म की 4 प्रकृतियाँ होती हैं, (देवायु, मनुष्यायु, नरकायु और त्रियंचायु कर्म)
-श्रेणी :- अघातिया कर्म
-प्रभाव :- मनुष्य-देव-नारकी-त्रियंच आदि भव धारण करना
-इसके नाश होने पर उत्त्पन्न गुण :- अवगाहनत्व गुण
-उत्कृष्ठ(ज्यादा से ज्यादा) स्थिति :- 33 सागर
-जघन्य(कम से कम) स्थिति :- अन्तर्मुहुर्त

6 - नाम कर्म

- जिस कर्म के उदय से अलग-अलग प्रकार के शरीर प्राप्त होते हैं, हमे देखते हैं कि कोई इतना सुंदर है, कोई कम सुंदर, कोई बलशाली, कोई कमज़ोर... शरीर के अंग-उपांग, सुंदरता-कुरूपता देने में जो कर्म फलदायी है उसे नाम कर्म कहते हैं !

उदाहरण :-
यह कर्म एक चित्रकार (painter) के जैसे स्वभाव वाला है, जिस तरह एक चित्रकार अपने मन के मुताबिक अलग अलग चित्र बनता है और उसके द्वारा बनाया हुआ कोई चित्र तो बहुत सुंदर बनता है और कोई चित्र नहीं ... उसी तरह नाम कर्म का स्वभाव है ...
बंध के कारण :-
मन-वचन-काय को सरल रखना, शुभ भावनाएं भाना आदि से शुभ नाम कर्म प्रकृतियों का बंध होता है,
और
मन-वचन-काय को कुटिल रखना, दुसरो को नीचा दिखाना, उनकी हंसी उड़ाना, नक़ल करना, आपस में लड़ाने से अशुभ नाम कर्म प्रकृतियों का बंध होता है !!!

कोई अत्यंत सुंदर है, तो वो उसके शुभ नाम कर्म का उदय है , किसी की आवाज़ बहुत मीठी है तो वो उसके सुस्वर नाम कर्म के उदय के कारण है ...

-प्रकृतियाँ:- नाम कर्म की सबसे ज्यादा 93 प्रकृतियाँ होती हैं
-श्रेणी :- अघातिया कर्म
-प्रभाव :- शरीरों कि रचना
-इसके नाश होने पर उत्त्पन्न गुण :- सूक्ष्मत्व गुण
-उत्कृष्ठ(ज्यादा से ज्यादा) स्थिति :- २० कोड़ा-कोड़ी सागर
-जघन्य(कम से कम) स्थिति :- 8 मुहूर्त

7 - गोत्र कर्म

- जिस कर्म के उदय से उच्च य़ा नीच कुल कि प्राप्ति होती है, उसे गोत्र कर्म कहते हैं !

उदाहरण :-
यह कर्म का स्वभाव एक कुम्हार (potter) के समान है, जिस तरह एक कुम्हार एक ही मिट्टी के कुछ छोटे तो कुछ बड़े बर्तन बनाता है ! उसी तरह गोत्र कर्म जीव कि ऊँची या नीची अवस्था बनाता है ...

गोत्र कर्म कि 2 प्रकृतियाँ हैं :-
१- उच्च गोत्र कर्म :-
इसके उदय से जीव लोक-पूजित, धार्मिक, बड़े घरों में जन्म लेता है !
अच्छा आचरण रखने वाले, पाप न करने वाले, अपनी-प्रशंसा व दूसरों कि निंदा न करने वाले आदि जीव इस गोत्र में जन्म लेते हैं !!!

२- नीच गोत्र कर्म :-
इसके उदय से जीव का जन्म लोक-निन्दित, हिंसक, दुराचारी, दरिद्री आदि कुलों में होता है !
हिंसा, चोरी, झूठ, घमंड, स्व-प्रशंसा,पर-निंदा करने वाले इस गोत्र में जन्म लेते हैं !
देव व भोग-भूमि के मनुष्यों का उच्च गोत्र होता है,
नारकी और त्रियंचों का नीच गोत्र होता है, और
कर्म-भूमि के मनुष्यों के दोनों गोत्र होते हैं !!!

-प्रकृतियाँ:- गोत्र कर्म की 2 प्रकृतियाँ होती हैं
-श्रेणी :- अघातिया कर्म
-प्रभाव :- कुल में जन्म
-इसके नाश होने पर उत्त्पन्न गुण :- अगुरुलघुत्व गुण
-उत्कृष्ठ(ज्यादा से ज्यादा) स्थिति :- २० कोड़ा-कोड़ी सागर
-जघन्य(कम से कम) स्थिति :- 8 मुहूर्त

8 - अंतराय कर्म

- जिस कर्म के उदय से किसी भी सही या अच्छे काम को करने में बाधा/दिक्कत उत्त्पन्न होती है, उसे अंतराय कर्म कहते हैं !

उदाहरण :-
जैसे दो भाई हैं, एक ने सोचा कि मंदिरजी में चटाइयां रखके आयेंगे, किन्तु दूसरे ने मना कर दिया ... एक बच्चा रोटी खा रहा है, और बन्दर रोटी छीन कर ले गया इत्यादि अंतराय कर्म के उदाहरण समझे जा सकते हैं ...

बंध के कारण :-
किसी को लाभ नहीं होने देना, नौकर-चाकर को धर्म सेवन नहीं करने देना, दान देने वाले को रोकना, दुसरो को दी जाने वाली वस्तु में विघ्न पैदा करना इत्यादि अंतराय कर्म के बंध के कारण बतलाये हैं !

- इसी कर्म के उदय में आने के कारण भगवान आदिनाथ को छह महीने तक आहार नहीं मिला था !!!

-प्रकृतियाँ:- गोत्र कर्म की 5 प्रकृतियाँ होती हैं
-श्रेणी :- घातिया कर्म
-प्रभाव :- दान आदि में बाधा होना
-इसके नाश होने पर उत्त्पन्न गुण :- अनन्तवीर्य गुण
-उत्कृष्ठ(ज्यादा से ज्यादा) स्थिति :- 3० कोड़ा-कोड़ी सागर
-जघन्य(कम से कम) स्थिति :- अन्तर्मुहुर्त

*** यह अंतराय कर्म "घातिया कर्म" है ... अघातिया नहीं ...

आठ कर्मों की 148 प्रकृतियाँ

- कुल 8 कर्म होते हैं !
- कर्म आठ होते हैं या केह सकते हैं कि प्रकृति के हिसाब से आठ कर्म होते हैं ... हर कर्म प्रकर्ति कि अपनी आगे उप-प्रकृतियाँ होती हैं !
कुल मिला कर आठ कर्मों कि 148 प्रकृतियाँ होती हैं !!!

हम "देव-शास्त्र-गुरु पूजा" कि जयमाला में बोलते हैं :- "कर्मन की त्रेसठ प्रकृति नाशि, जीते अष्टादश दोषराशि |1|
जे परम सुगुण हैं अनंत धीर, कहवत के छयालिस गुणगंभीर |2|"
63 प्रकृतियाँ के नाश होने पर जीव को केवलज्ञान प्राप्त हो जाता है, कौनसी 63 प्रकृतियाँ हैं ये ???

ज्ञानावरणीय कर्म की सारी 5 प्रकृतियाँ,
दर्शनावरणीय कर्म की सारी 9 प्रकृतियाँ,
मोहनीय कर्म की सारी 28 प्रकृतियाँ,
अंतराय कर्म की सारी 5 प्रकृतियाँ,
ये चारों घातिया कर्म हैं इनकी सारी (47) प्रकृतियाँ
और
अघातिया कर्मों की
आयु कर्म की 3 प्रकृतियाँ,
नाम कर्म की 13 प्रकृतियाँ ... कुल 16 प्रकृतियाँ ..


16+47 = 63 प्रकृतियाँ , इनके नाश होने पर जीव को केवलज्ञान प्राप्त हो जाता है !!!

और केवली के चौदहवें गुणस्थान में पहुँचते ही बाकी की (148-63 यानि 85) कर्म प्रकृतियों में से 72 का नाश हो जाता है ! और वे अपने जीवन काल के अंतिम समय में बाकी की बची हुई 13 प्रकृतियों का नाश करके सिद्ध अवस्था को प्राप्त कर सिद्धशिला पर विराजमान हो जाते हैं !!!
बाकी विषयों के लिए पढ़ते रहिये "जैनसार, जैन धर्म का सार ... "

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