हमारे पूर्व प्रबुद्ध ज्ञानीजन जैसे मनोहर वर्णीजी, पं.दौलत राम जी, पं.भूधर दास जी इत्यादि हम पर बड़ा उपकार करके गए हैं ...
अपने जीवन पर्यन्त किये हुए स्वाध्याय को उन्होंने हमारे लिए बहुत ही सरल शब्दों में छोटे-छोटे भजन, कोटेशन, वचन रूप कह दिया है ...

इनके यह शब्द "अमृत-तुल्य" ही हैं !
आइये इन छोटी-छोटी लाइनों को याद करें और इनका मनन करें !

जैसे चंदन का भार गधे पर लदा है पर उस चंदन की सुगंध गधा नहीँ ले सकता बल्कि आसपास के लोगोँ उसकी सुगंध लेते हैँ।
इसी प्रकार विषय-कषाय से ग्रसित मनुष्य के ज्ञान भी हो तो उसे उसका कोई लाभ नहीँ है, उस ज्ञान से दूसरे मनुष्य लाभ पा सकते हैँ किंतु उसका कुछ हित नहीँ होता ।1।

सहजानंद वर्णीजी

मनोहर ! जो भी तुम्हे दिखता है वह सब अजीव है, उसमेँ सुख-गुण है ही नहीँ । फिर वे तुम्हे सुख कैसे दे सकते हैँ ? अरे, जिनमेँ सुखगुण है ऐसी अन्य आत्माएँ भी अपना सुख तुम्हे तीन काल मेँ नहीँ दे सकती क्योंकि सब वस्तुएँ अपने-अपने गुणों मेँ ही परिणमन करती है ।2।

सहजानंद वर्णीजी

जहाँ क्रोध आदि भाव ही आत्मा के अपने नहीँ है, फिर शरीर,पुत्र, मित्र, धन, मकान क्या आत्मा के हो सकते हैँ ?
यथार्थ ज्ञान को अपनाओ यही तुम्हारा उद्धार करेगा ।3।

सहजानंद वर्णीजी

संसार यह चिल्लाता है - यह मेरी स्त्री है, यह मेरा बेटा है, यह मेरा मकान है । देखो ये ही शब्द भेदज्ञान की बातेँ बता रहे हैँ ।

यह मेरा है - ऐसा कहने मेँ यह ही तो आया यह-यह है, मैँ-मैँ हूँ ।
यह मेरा है। ऐसा तो कोई नहीँ कहता कि मैँ बैटा हूँ, मैँ स्त्री हूँ, मैँ मकान हूँ आदि।
भेदविज्ञान के लिए ज्यादा परिश्रम क्या करना है आंखोँ के सामने की ही तो बात है, अब ना मानने का क्या इलाज ।4।

सहजानंद वर्णीजी

हे प्रभु ! आप देना ही चाहते हैँ तो सुनो मैँ क्या चाहता हूँ, मेरे कभी कोई चाह पैदा ना हो, यही चाहता हूँ क्योंकि जो मैने अपनी चाह बताई वह आपका स्वरुप है ।
अब आपके स्वरुप से बढ़कर इस जगत मेँ कुछ है क्या जिसे मैं चाहूँ ? ।5।

सहजानंद वर्णीजी

मनोहर ! यदि कोई तुंहारी प्रशंसा करेँ तो उस उपद्रव से बचने के लिए परमेष्ठि की शरण मेँ पहुंचो, णमोकार मंत्र का स्मरण करो व आत्मचिंतन करने लगो ।6।

सहजानंद वर्णीजी

यदि कोई तुंहारी बुराई करता है तो यह सोचो यह दोष तुम मेँ है या नहीँ ।
यदि है तो बुरा मानने की बात ही क्या ?
वह तो तुंहेँ शिक्षा दे रहा है अतः परम मित्र हैँ।7।

सहजानंद वर्णीजी

आत्म-दर्शन होने पर कर्ता-अकर्ता में, श्रोता-अश्रोता में, वक्त-अवक्ता में बदल जाता है !
कर्म हों और कर्म का लेप न हो यही मानवीय चेतना का विकास है |8|

जिनेन्द्र वर्णीजी

बाकी विषयों के लिए पढ़ते रहिये "जैनसार, जैन धर्म का सार ... "

--- ---