प्र :- मद याने क्या ?
उ :- मद माने मान, घमंड, गुरुर, अहंकार ।

- सम्यक् दर्शन को दूषित करने वाले, मलिन करने वाले भावों का नाम है 'मद' ।
- अर्हन्त भगवान् जिन 18 दोषों से रहित हैं उनमे एक है 'मद' ।
- भगवान् द्वारा बतलाये दशलक्षण धर्म में आर्जव धर्म को रोक है ये 'मद' ।
ज्ञानी पुरुष कभी भी किसी भी अवस्था में मद नहीं करते, वे सर्वथा मान रहित हैं ।
मद का मूल कारण हो "कषाय", कषाय संसार वर्धन कराने वाली है, सो सम्यक्य्व का घात करने वाली है ।

ज्ञानं पूजां कुलं जाति, वलमर्द्वि तपो वपुः ।
अष्ठा वाश्रित्य मानित्वं, स्मयमा दुर्गतस्मया: ।।

१ - ज्ञान का मद,
२ - पूजा/प्रतिष्ठा/ऐश्वर्य का मद,
३ - कुल का मद,
४ - जाति का मद,
५ - बल का मद,
६ - ऋद्धि का मद,
७ - तप का मद
और
८ - शरीर/रूप का मद

- यह आठ मद सम्यक्त्व को दूषित करने वाले हैं !

मद = मदिरा क्यूँ ?
- क्यूंकि इन मद के आश्रय को पाकर यह जीव सब कुछ भूल जाता है ।

नशे में धुत व्यक्ति को कोई समझा नहीं सकता कोई औरों की तो बात ही क्या उसके सगे-सम्बन्धी जन भी उसे समझाने में असमर्थ हैं, उसी प्रकार अभिमानी व्यक्ति को कोई समझा नहीं सकता ।

1 - ज्ञान का मद

- वह अज्ञानी है जो स्वयं को ज्ञानी कहता है !!!

ज्ञानी पुरुष विचार करता है कि मेरा जो ज्ञान है वो इन्द्रिय-जनित है, ज्ञान रूपी सागर कि तुलना में मेरा तो एक बूंद समान ज्ञान है !
यह इन्द्रिय-जनित ज्ञान तो शरीर के साथ ही विनश जाने वाला है ! अनन्तों बार एक-दो-तीन-चार इन्द्रिय हुआ, इन्द्रियां भी पूरी नहीं मिली ! निगोद में "अक्षर के अनंतवें" भाग मात्र का ज्ञान मिला !
अब मानस जन्म मिला है, तो ज़रा सा ज्ञान पाकर "होशियार" बन रहा हूँ ... कितने नीच कार्यों में समय व्यातीत कर रहा हूँ !
- वो ज्ञान, जो मेरी निज आत्मा का स्वरुप है, उसका तो मुझे अभी भान ही नहीं है !
फिर इस अल्प-ज्ञान को पाकर मैं कैसे गर्वित होऊं ?
हम थोडा सा पढ़ लिख गए तो अपने ही परिजनों, मित्रजनों को मुर्ख समझने लगते हैं !
ज्ञानीपुरुष सोचता है, कि इस तुच्छ ज्ञान को पाकर भी अगर मद करूँगा तो पुनः नरक निगोद में भटकूंगा !

- ज्ञानी पुरुष का ध्येय तो केवलज्ञान कि प्राप्ति का होता है !

2 - पूजा/प्रतिष्ठा/ऐश्वर्य का मद

मेरी पूजा हो, लोग मुझे पूछें, समाज में मेरा नाम हो, प्रतिष्ठा हो, लोग मुझे जानें, ऐसा भाव रखना और इन्ही की पूर्ति के उद्देश्य से कार्यों को करना, सो पूजा/प्रतिष्ठा का मद है !

- अनंत जन्मों तक मैंने स्थावर योनियों में जन्म लिए !
जैसे :- धन-धान्य बना तो पैसे में ख़रीदा-बेचा गया ..
विकलत्रय बना तो पैरों से कुचला गया, पानी में बहाया गया !
फिर पंचेन्द्रिय शरीर मिला तो जानवर बन बाँधा-गया, मारा-पीटा गया, खाया गया !
अब कहीं जाकर मनुष्य जन्म मिला है, वह भी जैन कुल में .. यह किसी महान पुण्य कर्म का उदय है, इसे गवाना नहीं है !
महापुरुष विचार करता है कि यह तो मेरा कोई पुण्य प्रकृति का उदय है जो मेरा आदर-सत्कार-आवभगत हो रही है, इस पुण्य के क्षीण होते ही कोई मुझे पूछने वाला ना होगा !
मेरी तो आत्मा स्वयं पूजनीय है ... इस पर्याय की पूजा मात्र से मेरा भला नहीं होने वाला !

- लोग मंदिरों में, मेलों-ठेलों में, पञ्च-कल्याणकों में प्रतिष्ठा पाने हेतु अनाप-शनाप कार्य करते हैं, जिनका फल नियम से पाप जानना चाहिए !

याद रहे :- धर्म के कामों में मेरी पूजा/प्रतिष्ठा हो ऐसा भाव कदापि होना नहीं चाहिए !
जो प्रतिष्ठा/ऐश्वर्य मेरे पूर्व कृत कर्मों का फल है, उसका क्या घमण्ड़ करूँ ? यदि करूँगा तो नरक-निगोद में सड़कर बहुत दुःख भोगना पड़ेगा, ऐसा ज्ञानी जन विचार करते हैं !

3/4- कुल-जाति का मद

- पिता के गोत्र/वंश को "कुल" कहते हैं !

- माँ के पिता(नाना) के कुल को "जाति" कहते हैं !

कुल और जाति के मद एक जैसे ही हैं !

यह तो प्रायः ही देखने में आता है कि ज़रा कोई बात हुई नहीं कि हम कह देते हैं :-
तुम शायद जानते नहीं मैं किसका बेटा हूँ !
तुम्हे पता नहीं कि मेरे नाना-मामा कौन हैं !
इस संसार में जाति और कुल का मान कैसे किया जा सकता है ???
हमने अनन्तों बार नीच कुलों में खोटी गतियों में जन्म लिया है !
स्वर्ग के महान ऋद्धिधारी देव भी मरकर एकेन्द्रिय में जन्म ले लेते हैं, सिंह आदि क्रूर त्रियंच बन जाते हैं ! उत्तम कुल के होने पर भी मरकर चांडाल आदि में उत्त्पन्न हो जाते हैं !

- अपना जाति-कुल तो सिद्धों के समान है !
फिर क्यूँ हम माता-पिता से मिले इस पर्याय-सम्बन्धी जाति-कुल का अभिमान करें ?
जब मैंने अपने किये हुए किसी महान पुण्य कर्म के उदय से उत्तम जाति-कुल पाया है तो नीच जाति-कुल वालों के समान हिंसा, असत्य, परधन-हरण,कुशील-सेवन, अभक्ष्य-भक्षण इत्यादि करके नीच कुलों में जाने का प्रबंध क्यूँ करूँ ?
ज़रा पैसे वाले घर में, प्रतिष्ठित घर में, संपन्न घर में जन्म मिल लिया तो अपने से नीचे वालों को अपने आगे कुछ भी न समझना जैसी प्रवृति जाति-कुल का मद है !
इसमें मद नहीं करना ... ये तो सब नश्वर है, मेरे अंत के साथ ये सब भी नष्ट हो ही जायेगा !

चक्रवर्ती के इतने पुत्र होते हैं पर क्या वह अपने पिता के वैभव को भोग पाते हैं ??? चक्रवर्ती की नौ-निधियां, चक्र-रत्न, अथाह वैभव तो उन्ही के साथ समाप्त हो जाता है !
जब हमे ही अपने २-३ पीढ़ी पुराने पूर्वजों के नाम नहीं पता तो ये भी सत्य ही मानना कि हमारा नाम-पहचान भी हमारी आने वाली पीढ़ियों को नहीं पता चलेगा !!!
विचारना चाहिए कि जब अनन्तों तीर्थंकर हुए जीवों का नाम नहीं रहा, तो मेरा क्या रह जायेगा ? कौन जानता है कि पिछली से पिछली चौबीसी के पहले तीर्थंकर के माता-पिता का नाम क्या था ?
तो फिर मैं किस बात का मान रखूं ???

यह तो सुनिश्चित है, कि यदि इस दुर्लभ उत्तम जाति-कुल का सारा समय इसी के घमंड में चूर हो कर ही बिता दिया, तो यही उच्च जाति-कुल अनन्तों काल तक हमारे नीच जाति-कुल का कारण बनेगे !!!
यह उत्तम देश-कुल-जाति अभिमान करने को नहीं मिला ... ये तो कर्मों का उदय है, अब ये मिला है तो इसका सदुपयोग करने में ही बुद्धिमानी है !

- - सम्यग्दृष्टि के कर्मकृत पुद्गल पर्याय में कभी आत्मबुद्धि नहीं होती है !!!

5 - बल का मद

बल = शक्ति

- पाई हुई शक्ति का मान करना, बल मद है !

श्लाकापुरुष श्रीकृष्ण "नारायण पद" के धारी थे ... कितना असीम बल रहा होगा उनमे ... और सुनते हैं कि
"एक तीर के लगत कृष्ण की विनश गयी काया" ...
अरे जब नारायण जैसा महाबलशाली पुरुष एक तीर के वार से ढह गया, तो हम अपने बल पर कैसे मद करें ???
और वैसे भी हम बलवान बनते किसके सामने हैं ?
हमेशा किसी निर्बल-दीन-दुखी-असहाय-असमर्थ पर ही हम अपने बल का प्रदर्शन करते हैं, कहीं कोई हमसे ज्यादा बलशाली दिखा तो हम स्वयं को बलहीन दिखाने लगते हैं !!!

यदि मैं बलवान होकर निर्बलों का घात करूँ, असमर्थों का अपमान करूँ, धन-धरती-स्त्रियों का हरण करूँ, तो मेरा बल किसी क्रूर सिंह, भयंकर सांप आदि दुष्ट त्रियंचों के समान ही हुआ ना ???
जिसका फल दीर्घकाल तक नरकों के, त्रियंच-गतियों के और अनंतकाल तक निगोद में भटकना होगा !

इस प्रकार सोचूं तो "बल के मद" जैसा मेरी आत्मा का घातक अन्य कोई नहीं है !!!

6 - ऋद्धि का मद

ऋद्धि = संपत्ति/धन/वैभव

- पाई हुई संपत्ति/धन/वैभव का मान करना, ऋद्धि मद है !

- ज्ञानीपुरुष तो ऋद्धि तो भार/बोझ मानता है !
समस्त पापों का, आरम्भ-परिग्रहों का, मदों का, राग-द्वेष का, भय-संताप का, क्लेश-बैर का मूल ही यह धन-संपत्ति है !
यह सब तो धूल है, जो मेरी शुद्ध आत्मा के गुणों को ढंकने का कारण बनी हुई है !

मैं अपनी स्वाधीन, अविनाशी, आत्मिक-लक्ष्मी को छोड़ इस धूल के संचय में दिन-रात जुटा हुआ हूँ ... पहले इसे ही संचय करने में अमूल्य समय व्यर्थ गंवाया फिर उसी संपत्ति पर अभिमान करके, नियम से घोर संसार बढ़ाया !
ऐसा भाव ज़रूर ही आना चाहिए कि "हे भगवन्, वह शुभ दिन कब आएगा जब मैं समस्त परिग्रह के भार को छोड़कर अपने आत्मिक धन की सम्भाल करूँगा !!!

7 - तप का मद

तप = तपस्या
अपने द्वारा की हुई तपस्या का मान करना, तप मद है !

मंदिर जी में पूजन कर ली, कहीं कुछ दान में दे दिया, कुछ थोड़े नियम-व्रत-उपवास कर लिए .. तो हमे स्वयं से बड़ा तपस्वी कोई नज़र ही नहीं आता !

जब मैं :-
- खुद को इंद्रियों के विषयों में लगाने से रोक नहीं पाया हूँ,
- काम भाव को जीत नहीं पाया हूँ,
- नींद-आलस-प्रमाद मुझपे हावी हैं अब तक,
- इच्छाओं को रोकने में समर्थ नहीं हूँ,
- शरीर में लालसा घटा नहीं पाया हूँ,
- मरने का भय और जीवित रहने की इच्छा मिटा नहीं पाया हूँ,
- लाभ-अलाभ में समभाव जागृत कर नहीं पाया हूँ !
तो कैसा और किस काम का मेरा तप ???

इसका मद करूँ ???
धन्य हैं वो तपस्वी महापुरुष जिन्होंने अपने तप से महाप्रबल कर्म शत्रुओं को जीत कर अपने निज स्वरुप को पा लिया !!!
ऐसे विचार एक बार उत्त्पन्न होने पर, फिर तप का अभिमान नहीं रहेगा !

8- शरीर/रूप का मद

- पाए हुए शरीर/रूप का मान करना, बपु मद है !

मेरे जैसा सुंदर तो कोई हो ही नहीं सकता ! रूप का मद है !

- ज्ञानीपुरुष तो शरीर का मद कर ही नहीं सकता !!!
ऊपर से सुंदर-कांतिवान दिखने वाला, मोहित कर देने वाला यह शरीर अंदर से इतना अपावन है, कि पूरे जीवन इसे साफ़ करते रहो, फिर भी ये शुद्ध नहीं होने वाला, मांस के लोथड़े के समान हेय है !!!
इसे सुबह-शाम खिलाते-पिलाते रहे, तो ये स्वस्थ है, अन्यथा जर्जर हो जाता है, इसका कैसे मद करूँ ?

नौ द्वारों से निरंतर मल उत्त्पन्न करने वाले इस देह से कोई मुर्ख ही प्रतीति बढ़ाएगा ! और हम तो निरे ही मुर्ख हैं, जो मूर्खता वश इस शरीर को ही अपना स्वरुप मान कर इसपे मद करके या इससे ग्लानि करने के कारण अनंत काल से इन नाना-प्रकार के शरीरों में जन्म-मरण कर रहे हैं !
जब तक इसमें प्राण हैं, तभी तक यह मोहित करता है ! मृत्यु होते ही, रूपवान देह से भी भय लगने लगता है !
और वैसे भी ये कहाँ सदा के लिए साथ रहने वाली है ! आज मिली अत्यंत सुंदर देह ही कल विष्ठा के कीड़े में परिवर्तित हो जायेगी !

ज्ञानी तो विचार करते हैं कि बड़े अहो भाग्य से यह मनुष्य-देह रूपी नाव मिली है, अब तो इस नाव में बैठकर संसार सागर से सदा के लिए पार हो जाऊं, और फिर किसी देह में दुबारा न आऊँ !
इस तरह हमने 8 मदों को समझ पाने का प्रयास किया !

*** ये 8 मद समयग्दर्शन का नाश करने वाले हैं, मैं स्वप्न में भी इन्हे न करूँ ...

बाकी विषयों के लिए पढ़ते रहिये "जैनसार, जैन धर्म का सार ... "

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