प्र:- कैसा है यह भय ?

प्र:- कैसा है यह भय ?
- भय के होते ही जीव थर-थर कांपने लगता है, सुध-बुध खो बैठता है, इधर-उधर भागने/छिपने लगता है ! भय तो मृत्यु की लघुभ्राता समान है !
-अरिहंत भगवान इस भय रूप दोष से सर्वथा मुक्त हैं !
- जिनागम में "भय" 7 प्रकार का बतलाया है !

इसभव भय, परलोक भय मरन वेदना जानु !
अनरक्ष, अनुगुप्ति भय, अकस्मात् भय सात !!

१- यह लोक भय,
२- परलोक भय,
३- मरण भय,
४- वेदना भय,
५- अनरक्षा का भय,
६- अगुप्ति का भय,
और
७- अकस्मात् भय

इन सात भयों से मुक्त होकर घोर उपसर्ग और परिषह का प्रसंग आने पर भी निज-निरंजन-निर्दोष परमात्मतत्व की प्रतीति से चलित न होने को सम्यक-दर्शन के आठ अंगों में से एक "नि:शंकित अंग" कहा हैं !
- भय का अभाव और तत्व के विषय में संशय का अभाव, सो नि:शंकित अंग है !

1 - इहलोक भय

- वर्तमान पर्याय से सम्बंधित किसी भी प्रकार के भय को "इहलोक भय" कहते हैं !
जैसे :- इस लोक में मेरा जीवन कैसे गुजरेगा ! धन की आय का उपाय कम होता जा रहा हैं, ऐसे-ऐसे कानून बनते जा रहे हैं, जिससे संपत्ति का रहना कठिन हो रहा है, बुढ़ापे में क्या होगा, संतानें कैसी होंगी आदि भाव इहलोक भय के उदाहरण हैं !

- ज्ञानीजीव को इस-लोक का भय नहीं होता, क्यूंकि वह तो अपनी आत्मा को ही लोक समझता है, उसमे पर का प्रवेश नहीं !!!

2 - परलोक भय

- वर्तमान पर्याय में भावी पर्याय से सम्बंधित भय का होना, सो परलोक भय है !
जैसे :- अगले जन्म में पता नहीं कौन सी गति मिलेगी, कहीं खोटी गति न मिल जाये, नरक में न जाना पड जाए, कष्ट न झेलने पड जाएँ आदि भाव परलोक भय के उदाहरण हैं !

- ज्ञानीजीव को पर-लोक का भय नहीं होता, क्यूंकि वह तो मानता है की उसकी पूंजी तो उसका ज्ञान और दर्शन गुण हैं ! जो इस लोक और परलोक में सदा उसके साथ ही रहने वाली है !

3 - मरण भय

- मरण समान भय कोई अन्य नहीं !

-किन्तु ज्ञानी पुरुष मानते हैं कि "मेरे प्राण तो ज्ञान और दर्शन हैं" जिनका वियोग कभी हो नहीं सकता ! अतः मेरा मरण होता ही नहीं है !

4 - वेदना भय

- मुझे कभी कोई रोग न हो जाए, कभी सुई न लगे, चीड़-फाड़ न हो, कोई रोग बढ़ ना जाए, इस प्रकार भाव अथवा व्याधि की पीड़ा को भोगते हुए भयभीत होना, सो वेदना भय है !

- ज्ञानी जीव को यह भय नहीं सताता, क्यूंकि उसके यह प्रतीति रहती है कि "मैं सर्वज्ञ ज्ञान का ही वेदन करता हूँ, रोग-व्याधि आदि का नहीं !!!

5 - अनरक्षा का भय

- मेरा कोई रक्षक, सहायक, मित्र, शरण नहीं है, संकट में मेरी रक्षा कैसे होगी, कहीं कुछ हो गया तो मुझे कौन बचाएगा ? इस प्रकार के भाव को अनरक्षा भय कहा है !

- ज्ञानी जन को यह भय नहीं है, क्यूंकि वह "निजस्वरूप" को ही अपनी शरण मानते हैं, और वह तो सदा साथ ही है !

6 - अनुगुप्ति भय

- मेरे रहने का स्थान सुरक्षित नहीं है, मकान कमज़ोर है, कोई भी कभी भी आ सकता है ! कोई मज़बूत किला तो है नहीं ! कोई मेरे स्थान पर आ गया तो मेरा क्या होगा ! इस जैसे भय को "अनुगुप्ति भय" कहा है !

- ज्ञानी जन को यह भय नहीं वह मानते हैं कि किसी द्रव्य में किसी अन्य द्रव्य का प्रवेश ही नहीं हो सकता !
अतः सर्व द्रव्य स्वयं गुप्त हैं ! ऐसी उनकी प्रतीति रहती है !

7 - अकस्मात् भय

- संभव,असंभव जो आपत्तियां/विपदाएं/संकट होंगे अथवा नहीं भी होंगे, किन्तु उनकी कल्पना करके ही भयभीत होते रहने को "आकस्मिक भय" कहते हैं !

- ज्ञानी जीव मानते हैं कि

जो-जो, जब-जब, जैसे-जैसे, जहाँ-जहाँ, जिस-जिस के द्वारा होना है, वो-वो, तब-तब, वैसे-वैसे, वहां-वहां, उस-उस के द्वारा होकर ही रहेगा ! तो भय किस बात का ?

- जहाँ भय का भाव रहेगा, वहां ज्ञान का अभाव रहेगा ! इसलिए यह भय त्याज्य है !

- नमन है परम शुद्ध ज्ञान की उस अवस्था को जिसमे भय का लोप हो जाता है !


बाकी विषयों के लिए पढ़ते रहिये "जैनसार, जैन धर्म का सार ... "
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