स्वामी श्रीमन्नेमीचन्द्रसैद्धांतिचक्रवर्ती जी ने गोम्मटसारजी जीवकांड में बताया है कि :-

लिपंइ अप्पीकीरइ एदीए णियअपुण्‍णपुण्‍णं च !
जीवोत्ति होदि लेस्सा लेस्सागुणजाणयक्खादा !!४८८!!


अर्थात,

- जो लिम्पन करती है, याने को कर्मों को आत्मा से लिप्त करती है, वह लेश्या है !
- जिसके द्वारा आत्मा पुण्य-पाप से अपने को लिप्त करती है, वह लेश्या हैं !
- जो कर्म-स्कंध से आत्मा को लिप्त करता है, वह लेश्या है !

जैसे, मिट्टी,गेरू आदि के द्वारा दीवार रंगी जाती है, उसी प्रकार शुभ-अशुभ भाव रूप लेप के द्वारा आत्मा का परिणाम लिप्त किया जाता है !!!
यह भी कह सकते हैं कि :-
मनुष्य के अच्छे-बुरे भावों को लेश्या कहते हैं !

आगे जिस प्रकार थर्मामीटर से शरीर का ताप नाप जाता है, उसी प्रकार "भावों के द्वारा" आत्मा का ताप अर्थात उसकी लेश्या का पता चलता है !!!
- कषायों के उदय से अनुरंजित मन-वचन-काय की प्रवत्ति को लेश्या कहते हैं !!!

-----------------
लेश्या के भेद :-
-----------------

तीव्रता और मंदता की अपेक्षा से लेश्या 6 प्रकार की होती है :-
१- तीव्रतम,
२- तीव्रतर,
३- तीव्र
४- मंद,
५- मंदतर,
६ - मंदतम

और,
द्रव्य और भाव के भेद से लेश्या २ प्रकार की होती है ...

-----------------
१: - द्रव्य लेश्या
-----------------
- "वर्ण नाम-कर्म" के उदय से प्राप्त शरीर का रंग द्रव्य लेश्या है !
- यह आयु पर्यन्त एक सा ही रहता है !
- यह लेश्या आत्मा का उपकार या अपकार नहीं करती है, और इससे कर्म बंध नहीं होता !

-----------------
२: - भाव लेश्या
-----------------
मन-वचन और काय योग से जो भी काम हम करते हैं, वह किसी न किसी कषाय से प्रेरित ही होती है !
--> कषाय से अनुरंजित मन-वचन-काय की प्रवृत्ति भाव लेश्या है !
- इनसे कर्म बंध होता है !
- जीव के परिणामों के अनुसार यह लेश्या बराबर बदलती रहती है !
तीव्रता और मंदता की अपेक्षा से लेश्या 6 प्रकार की होती है :-

१- तीव्रतम,
२- तीव्रतर,
३- तीव्र
४- मंद,
५- मंदतर,
६- मंदतम

इन भावों को रंगों से उपमित करने से इन्हे क्रमशः

१- कृष्ण - भौंरे के समान काला रंग
२- नील - नीम मणि से समान रंग
३- कापोत - कापोत(कबूतर) के समान रंग
४- पीत - सुवर्ण के समान रंग
५- पद्म - कमल के समान रंग
६- शुक्ल - शंख के समान रंग

- कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पद्म और शुक्ल लेश्या कहते हैं !!!

द्रव्य और भाव लेश्या इन्ही 6 प्रकार की होती हैं ... सामान्य की अपेक्षा से यद्धपि लेश्या के 6 भेद हैं किन्तु पर्यायर्थिक नय की अपेक्षा से लेश्याओं के असंख्यात लोक प्रमाण भेद होते हैं !!!

इन छह में से किस लेश्या में जीव की कैसी प्रकृति(भाव) व पहचान होती है ???

१- कृष्ण लेश्या :-


जो तीव्र-क्रोधी, लड़ाकू, झगड़ालू, धर्म से रहित, स्वछंद, विषयों में आसक्त, मायावी, आलसी, डरपोक, दुराग्रही, निर्दयी, असंतोषी हो ... वह कृष्ण लेश्या वाला जीव है !

२- नील लेश्या :-


जो बहुत निद्रालु , धन-धान्य के संचय में तीव्र लालसा रखता हो, विषयों में आसक्त हो, दुसरो को ठगने को तत्पर हो, मायाचारी हो, अतिलोभी हो, ये नील लेश्या वाले जीव के लक्षण हैं !

३- कापोत लेश्या :-


पर की निंदा करने वाला, स्व-प्रसंशा करने वाला, दूसरों से ईर्ष्या करने वाला, शोक अधिक करने वाला, दूसरे का विश्वास न करने वाला, अन्य को अपने से हीन समझने वाला, लड़ाई-झगडे-रण में मरने को उद्धम, यह कापोत लेश्या वाले जीव के लक्षण मानना !

४- पीत लेश्या :-


समदर्शी, दया-दान में रत, मृद-भाषी, ग्यानी, अपने कर्तव्यों को जानने वाला, सेव्य-असेव्य को जानने वाला, सत्यवादी इत्यादि गुणों का धारी जीव पीत लेश्या का होता है !

५- पद्म लेश्या :-


जो त्यागी, भद्र, सच्चा, क्षमाशील, उत्तम कार्यों में लग्न, गुरु व देव की स्तुति करने वाले जो हैं, सो पद्म लेश्या का जीव हैं !!!

६- शुक्ल लेश्या :-


जो पक्षपात रहित हो, सम-व्यवहारी हो, किसी से ना राग, न द्वेष, पाप कर्मों से उदासीन हो, परम संतोषी हो, उसे शुक्ल लेश्या का जीव मानना !!!

इन छह लेश्या वाले छह व्यक्तियों के मन में कैसे भिन्न-भिन्न भाव होते हैं सो स्वामी श्रीमन्नेमीचन्द्रसैद्धांतिचक्रवर्ती जी ने उदाहरण देकर गोम्मटसारजी जीवकांड में दर्शाया है !!!

आचार्यश्री कहते हैं कि कृष्ण आदि छह लेश्या वाले छह पथिक वन में किसी फलदार वृक्ष को देखकर अपने अपने मन इस प्रकार विचार करते हैं, और उसके अनुसार वचन कहते हैं !

------------
१- कृष्ण लेश्या :-
------------
कृष्ण लेश्या वाला व्यक्ति विचार करता है और कहता है कि मै इस वृक्ष को जड़ सहित उखाड़कर इसके फलों को खाऊंगा !

------------
२- नील लेश्या :-
------------
ये विचारता है और कहता है कि मै इस वृक्ष को स्कंध से काटकर, उस स्कंध के सारे फल खाऊंगा !

------------
३- कापोत लेश्या :-
------------
ये विचार करता है कि थोड़े से ही तो फल खाने हैं, पूरा वृक्ष क्यूँ नष्ट करूँ ? और कहता है कि मै इस वृक्ष की २ सबसे बड़ी शाखाओं को काटकर उनके फलों को खाऊंगा !

------------
४- पीत लेश्या :-
------------
यह कहता है, कि मै इस वृक्ष की २ छोटी-छोटी शाखाओं को काटकर उनके फलों को खाऊंगा !

------------
५- पद्म लेश्या :-
------------
यह जीव विचारता है और कहता है कि मै वृक्ष या शाखा क्यूँ तोडूँ ?
मै सिर्फ शाखा से लटके फलों को ही तोड़ कर खाऊंगा !

------------
६- शुक्ल लेश्या :-
------------
यह जीव कहता है कि मै तो इस वृक्ष से स्वयं टूट कर गिरे हुए फलों को ही खाऊंगा !!!

सो कृष्ण से शुक्ल तक संक्लेश परिणामों की हानि-वृद्धि इस प्रकार होती है :-
१- तीव्रतम २- तीव्रतर ३- तीव्र ४- मंद ५- मंदतर ६- मंदतम

- इस तरह मनपूर्वक वचनादि कि जो प्रवृत्ति होती है, वह लेश्या का कर्म है !

साथ में संलग्न चित्र में इन छह लेश्या वाले व्यक्तिओं को अंकित नंबर और देह के रंग से उनकी लेश्या अनुसार पहचानना !

------------
शुभ-अशुभ लेश्या
------------
इन छह लेश्याओं को भावों के अनुसार "शुभ-अशुभ" रूप दो श्रेणी में भी कहा है :-

१- अशुभ लेश्या :- छ्ह में से पहली ३ याने कृष्ण, नील और कापोत अशुभ लेश्या कही हैं !
२- शुभ लेश्या :- अंत की ३ शुभ हैं

- मैत्री, क्षमा, शांति, आदि भाव वाले व्यक्ति के शुभ लेश्या होती हैं,
- हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, घृणा, शोक, द्वेष भाव वालो के अशुभ लेश्या होती हैं !

शुभ लेश्याओं से ही जीव का उत्थान सम्भव है ...


------------
गतियों में लेश्या :-
------------
- सम्पूर्ण नारकी कृष्ण वर्ण हैं, मतलब कृष्ण लेश्या वाले हैं !
- कल्पवासी देवों कि द्रव्य लेश्या(शरीर का वर्ण) भाव लेश्या के समान ही होता है !
- भवनवासी, व्यंतर, ज्योतिषी, मनुष्य, त्रियंच इनमें छहों लेश्या होती हैं !


------------
लेश्याओं में परिणमन :-
------------
कृष्ण, नील और कापोत इन तीन अशुभ लेश्याओं में संक्लेश भावों की हानि/कम होने से यह जीव ऊपर से नीचे परिणमन करता है,
याने
आत्मा की जिस-जिस तरह से संक्लेश परिणति कम होती जाती है उसी-उसी तरह से यह आत्मा अशुभ लेश्याओं में से उत्कृष्ट कृष्ण लेश्या को छोड़ कर नील और आगे कापोतरूप लेश्या में परिणमन करता है !

और ठीक इसी प्रकार,

आत्मा के परिणामों में उत्तरोत्तर विशुद्धि की वृद्धि होने यह आत्मा शुभ लेश्याओं में नीचे से ऊपर परिणमन करता है ... जघन्य पीत लेश्या को छोड़ कर पद्म और आगे शुक्लरूप लेश्या में परिणमन करता है !

------------
गुणस्थानों में लेश्याएँ :-
------------
- पहले से चौथे गुणस्थान तक :- छहों लेश्याएँ होती हैं !
- पांचवें से सांतवे गुणस्थान तक :- तीन (पीत, पद्म और शुक्ल लेश्याएँ होती हैं)
- आंठवें से तेरहवें गुणस्थान तक :- शुक्ल लेश्या होती है !

------------
अलेश्य :-
------------
आयोगकेवली और सिद्ध भगवान् अलेश्य हैं, अर्थात इनके कोई भी लेश्या नहीं होती !!!

सो, इस प्रकार हमने लेश्याओं को समझा ... यह विषय समाप्त हुआ ...
बाकी विषयों के लिए पढ़ते रहिये "जैनसार, जैन धर्म का सार ... "
--- ---