लोक - पृष्ठ भूमिका


द्रव्य 6 होते हैं
जीव
पुद्गल
धर्म
अधर्म
आकाश
और
काल

इसमें से आकाश द्रव्य के २ भेद हैं :-

१ - लोक/लोकाकाश
२ - अलोक/अलोकाकाश

- जितने क्षेत्र में 6 द्रव्य ठसाठस भरे हुए हैं, वो लोक/लोकाकाश है,
उसके(लोकाकाश) के बाहर बाकी अनांतनत अलोक/अलोकाकाश है !

प्र :- कैसा है ये लोक ?
उ :- 7 पुरुष एक के पीछे एक-एक खड़े होकर पैर पसारे हुए और कमर पर हाथ रखे हुए खड़े हों, उन जैसा आकर इस लोक का है ! केवल उनका मुख जितना आकार हटा दिया जाए तो ...

- इस लोक का कोई करने वाला नहीं है, और ना ही कोई हरने वाला है इसे, ये लोक अनादि काल से है, ये लोक अनंत काल तक रहेगा !

- अनंतानंत जीव कर्मों के वश में आकर अनंत काल से इस लोक में भटक रहे हैं !

- लोक की रचना को जानने के लिए, उससे सम्बंधित कुछ अन्य शब्दों के अर्थ पहले जानने होंगे, जैसे :-

- योजन
- राजू
- वातवलय इत्यादि
क्यूंकि ये शब्द बार बार उपयोग में आयेंगे !

-- "योजन" और "राजू" को समझेंगे, ये दोनों ही क्षेत्र-सम्बन्धी मापक हैं :-

8 जौ के दाने = 1 अंगुल
12 अंगुल = 1 बिलांद
2 बिलांद = 1 हाथ
4 हाथ = 1 धनुष
2000 धनुष = 1 कोस या 2 मील
4 कोस(8 मील) = 1 लघु-योजन --> जीवों के शरीर, मंदिर, नगर इत्यादि को मापने हेतु
2000 कोस (4000 मील) = 1 महायोजन --> पर्वत, द्वीप, समुद्र इत्यादि को मापने हेतु
और
ऐसे असंख्यात महा-योजन = 1 राजू !

इस 1 राजू को णमोकार-ग्रन्थ में आचार्य-रत्न श्री देशभूषण जी महाराज ने बहुत स्पष्टता से समझाया है :-
कि मान लीजिये कोई देव पहले समय में एक लाख योजन, दूसरे समय में २ लाख योजन गमन करे, और इसी प्रकार प्रति-समय दुगना-दुगना गमन करता हुआ अढ़ाई सागर याने 25 कोड़ा-कोड़ी उद्धार पल्य तक लगातार बिना रुके चलता रहे, तब वह आधा राजू चल पायेगा, इसे दोगुणा करने से जो क्षेत्र होगा, वही "एक राजू" का प्रमाण है !
और यही हमारे मध्य लोक कि चौड़ाई है !
हमारी सोच से भी परे है इस लोक का विस्तार ...

लोक का आकार



लोक के आकार के लिए चित्र देखें ...

ऊंचाई :- 14 राजू है
मोटाई :- हर जगह से 7 राजू है
चौड़ाई :- - नीचे मूल में 7 राजू,
फिर ऊपर को क्रमशः घटता-घटता 7 राजू की ऊंचाई पर मध्य में 1 राजू चौड़ा और फिर अनुक्रम से बढ़ता-बढ़ता साढ़े-तीन राजू की ऊंचाई पर याने मूल से(नीचे से) कुल साढ़े दस राजू की ऊंचाई पर "ब्रह्मलोक"(पांचवा स्वर्ग) के पास 5 राजू चौड़ा है और फिर पांचवें स्वर्ग से क्रम से घटता-घटता 14 राजू की ऊंचाई पर याने अंत में/शीर्ष पर 1 राजू चौड़ा है !

- तीनलोक का आयतन(volume) 343 घन राजू है !

वातवलय


- जैसे पेड़ की छाल जैसे पूरे पेड़ को घेरे रहती है, या जैसे हमारे शरीर के ऊपर सर्वांग चाम(खाल) होती है ठीक वैसे ही सम्पूर्ण लोक को चारों तरफ से 3 वातवलयों(वातावरणों) ने घेरा हुआ है !

- ये एक प्रकार की वायु/हवाएं जैसी हैं !

१ - धनोदधि वातवलय - वाष्प का घना वातावरण, गौमूत्र के समान रंग वाला
२ - घन वातवलय - घनी हवा का वातावरण, मूंग(अन्न वाली) के समान रंग वाला
३ - तनु वातवलय - हलकी/पतली हवा का वातावरण, ये अनेक रंगों को धारण किये हुए है !

- इन तीनो में सबसे पहले धनोदधि वातवलय लोक का आधार है उसे घेरे हुए घन वातवलय और आगे उसे घेरे हुए तनु वातवलय हैं !
ये लोक इन्ही तीनो वातवलयों के आधार पर स्थित है !
और ये तीनो वातवलय आकाश द्रव्य के आधार पर स्थित हैं ...

- आकाश द्रव्य स्व-प्रतिष्ठित है उसे अन्य के आश्रय की ज़रुरत नहीं !

इन 3 वातवलयों का क्रम और मोटाई चित्र मे देखें !

- इस प्रकार अनन्तानन्त अलोकाकाश के बीचो-बीच "लोक" कुछ इस प्रकार स्थित है जैसे किसी कमरे में छींका बिना रस्सी के लटक रहा हो !

1 - अधोलोक


- लोक का निचला भाग अधोलोक कहलाता है !
इसकी :-
ऊंचाई - 7 राजू
मोटाई - 7 राजू
और
चौड़ाई -नीचे 7 और ऊपर 1 राजू है !

- मध्य लोक में मेरु के नीचे क्रम से एक के नीचे दूसरी इस प्रकार 7 भूमियां हैं ... जिन्हे "नारकियों का निवास स्थान" होने के कारण नरक कहते हैं !

- इन सात पृथ्वियों/नरकों के बीच में आपस में असंख्य योजनों का अंतर है !




१ - रत्नप्रभा (धम्मा) - 1,80,000 योजन मोटा
२ - शर्कराप्रभा (वंशा) - 32,000 योजन
३ - बालुकाप्रभा (मेघा) - 28,000 योजन
४ - पंकप्रभा (अंजना) - 24,000 योजन
५ - धूमप्रभा (अरिष्टा) - 20,000 योजन
६ - तमः प्रभा (मघवी) - 16,000 योजन
७ - महातमः प्रभा (माघवी) - 8,000 योजन


पहली "रत्नप्रभा (धम्मा)" पृथ्वी है, इसके 3 भाग हैं :-

१ - खर भाग - 16,000 योजन मोटा है, इसमें 9 प्रकार के भवनवासी देव और 7 प्रकार के व्यंतर देव रहते हैं !
२ - पंक भाग - 84,000 योजन मोटा है, इसमें बाकी के असुरकुमार (भवनवासी देव) और राक्षस (व्यंतर देव) रहते हैं !
३ - अब्ब्हुल भाग - 80,000 योजन मोटा, अब्ब्हुल भाग है, इसमें प्रथम नरक है ! इसमें नारकी रहते हैं !

- इस प्रकार पहली पृथ्वी की मोटाई 1,80,000 योजन होती है !
फिर बीच में तीन वातवलय हैं, उसके नीचे दूसरी शर्कराप्रभा और इसी प्रकार बाकी के छह नरक हैं !

==> कलकल-पृथ्वी/निगोद :- सांतवे नरक "महातमः प्रभा" के बाद 1 राजू ऊँचा खाली क्षेत्र है ! जिसे कलकल पृथ्वी कहते हैं !
इसमें पञ्च-स्थावर और निगोदिया जीव रहते हैं !

- पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा और पांचवें नरक का ऊपरी भाग अत्यंत गर्म है !
- पांचवें नरक का नीचे का, छठा और सांतवा नरक भयंकर ठन्डे हैं !

इन सभी नरकों में पहले से सांतवे नरक तक जाते हुए वेदना, अवगाहना, आयु सब बढ़ते चलते हैं, और इसके अंत में निगोद है, निगोद के दुःख की तो चर्चा ही क्या !

2 - मध्य लोक


हमने पढ़ा कि लोक प्रमाण 14 राजू का है, उसमे से नीचे के 7 राजू क्षेत्र में "अधोलोक" है ! अधोलोक के ऊपर ... मध्यलोक है ... जहाँ हम और आप रहते हैं !
लोक के मध्य में स्थित है, इसलिए इसे मध्य लोक कहते हैं !


इसकी :-
ऊंचाई - 1,00,040 योजन
मोटाई - 7 राजू और
चौड़ाई - 1 राजू है !

- मध्य-लोक में असंख्यात द्वीप और असंख्यात समुद्र हैं !

- मध्य लोक के बिल्कुल बीचों-बीच थाली के आकार का 1,00,000 योजन विस्तार वाला पहला द्वीप "जम्बू-द्वीप" है !
- यह चूड़ी के आकार का है !

- इसके बाद इसे चारों तरफ से घेरे हुए पहला समुद्र लवण-समुद्र है, जो कि इस(जम्बू-द्वीप) से दूने विस्तार वाला है !

मध्य लोक के कुछ द्वीप, उनके समुद्र और उनके विस्तार :-


क्र:-    द्वीप/समुद्र      विस्तार
---------------------------------------
1 -   जम्बूद्वीप      एक लाख योजन
2 -   लवणसमुद्र      दो लाख योजन
3 -   घातकीखंड द्वीप      चार लाख योजन
4 -   कालोद समुद्र      आठ लाख योजन
5 -   पुष्करवर द्वीप      सोलह लाख योजन
6 -   पुष्करवर समुद्र      बत्तीस लाख योजन
7 -   वारुणीवर द्वीप      पिछले से दोगुना
8 -   वारुणीवर समुद्र      वारुणीवर समुद्र

--> इस क्रम में "आंठवा द्वीप = नंदीश्वर द्वीप" है !
तेरहवां द्वीप "रुचकवर द्वीप" है, इस द्वीप तक ही अकृत्रिम चैत्यालय हैं !


इसी प्रकार असंख्यात द्वीप और समुद्र मध्य-लोक में हैं ! आगे के द्वीप का जो नाम है, वही उसके समुद्र का नाम है !
इन द्वीपों और समुद्रों का विस्तार आगे आगे दोगुना होता चला गया है !

अंतिम द्वीप = स्वयंभूरमणद्वीप है
अंतिम समुद्र = स्वयंभूरमण समुद्र है !

पहला द्वीप - जम्बू-द्वीप

- मध्य लोक के बिल्कुल बीचों-बीच 1,00,000 योजन विस्तार वाला पहला द्वीप "जम्बू-द्वीप" है !
- जम्बू-द्वीप थाली के आकार वाला है !



इसके बाद इसे चारों तरफ से घेरे हुए पहला समुद्र लवण-समुद्र है, जो कि इस(जम्बू-द्वीप) से दूने विस्तार वाला है !
- लवण समुद्र चूड़ी के आकार वाला है ।

- जम्बू-द्वीप के उत्तर-कुरु भोगभूमि में अनादिनिधन जम्बू(जामुन) का वृक्ष है, जिसके कारण ही इस द्वीप का नाम जम्बू-द्वीप पड़ा !
- यह वृक्ष वनस्पतिकायिक नहीं पृथ्वीकायिक है !

- जम्बू-द्वीप में 6 कुलाचल पर्वत तथा 7 क्षेत्र हैं :-
6 कुलाचल पर्वतों के नाम :-
हिमवान्
महाहिमवान्
निषध
नील
रुक्मि
और
शिखरी !

यह छह कुलाचल पर्वत पूर्व से पश्चिम तक चलते हुए, दोनों तरफ से लवण समुद्र को छूते हुए जम्बू द्वीप को 7 क्षेत्रों में बांटते हैं !

7 क्षेत्रों के नाम :-
भरत
हैमवत
हरि
विदेह
रम्यक्
हैरण्यवत
और
ऐरावत !

भरत क्षेत्र से विदेह क्षेत्र तक इन कुलाचल पर्वतों का और क्षेत्रों का विस्तार दोगुना होता गया है !
फिर विदेह क्षेत्र से अंतिम ऐरावत क्षेत्र तक यह आधा-आधा होता गया है !

- जम्बू-द्वीप के विदेह क्षेत्र में बिलकुल बीचो-बीच एक लाख चालीस (1,00,040 योजन) ऊँचा "सुमेरु-पर्वतराज" है ! इतनी ही ऊंचाई मध्य लोक की है !

इसी सुमेरु-पर्वतराज पर पृथ्वी-तल से 99,000 योजन ऊपर स्थित "पाण्डुक-शिला" पर सौधर्म-इंद्र "भरत-क्षेत्र" के तीर्थंकरों का जन्माभिषेक किया करते हैं !
- सुमेरु-पर्वत और पहले सौधर्म-स्वर्ग(उर्ध्व-लोक) के बीच में "एक बाल" का अंतर है !
जम्बू-द्वीप के 7 क्षेत्रों के "भरत-क्षेत्र" में हम और आप रहते हैं !
"भरत-क्षेत्र" की और उसमे हम कहाँ रहते हैं उसकी चर्चा आगे करेंगे !

जम्बूद्वीप -> भरत क्षेत्र



हमने पढ़ा कि जम्बू-द्वीप को 6 कुलाचल पर्वत, पूर्व से पश्चिम (दोनों तरफ से लवण समुद्र को छूते हुए) तक जाते हुए, 7 क्षेत्रों में विभाजित करते हैं !
इन सात में सबसे नीचे दक्षिण दिशा में है हमारा "भरत-क्षेत्र" स्थित है !

- भरत-क्षेत्र का विस्तार जम्बू-द्वीप का 1/190वाँ , याने 1,00,000/190 या 526 6/19 योजन है !

- भरत-क्षेत्र के उत्तर-दिशा में पहला कुलाचल पर्वत(हिमवान् पर्वत) है, पूर्व-पश्चिम और दक्षिण दिशाओं में लवण-समुद्र है !

जैसे जम्बू-द्वीप में 6 कुलाचल पर्वत हैं, उसी तरह भरत-क्षेत्र में बीच में "विजयार्ध-पर्वत" है, जो इसे 2 भागों में विभाजित करता है !

हिमवान् पर्वत से गंगा और सिंधु नदियां विजयार्ध-पर्वत से होती हुईं दक्षिण में लवण-समुद्र में गिरती हैं जिसके कारण ये दोनों भाग आगे 3-3 खण्डों में बंटे हुए हैं !

- इस प्रकार भरत-क्षेत्र में "छह-खंड" हैं !

फिर से समझें, कि भरत-क्षेत्र में छह खंड हैं, जिनमे से :-
3 विजयार्ध पर्वत के ऊपरी भाग में हैं
और
3 विजयार्ध पर्वत के निचले भाग में !

नीचे के जो 3 खंड हैं, उनमे से बीच वाला "आर्य-खंड" है !
बाकी 5 "मलेच्छ खंड" कहलाते हैं !

बिलकुल ऐसा ही जम्बू-द्वीप में सबसे ऊपर स्थित "ऐरावत-क्षेत्र" है ... वहाँ भी यही सब है, किन्तु गंगा-सिंधु के स्थान पर रक्त और रक्तोदा नदियां बहती हैं, जो विजयार्ध-पर्वत से होती हुई ऐरावत क्षेत्र को छह-खण्डों में विभक्त करती हैं !

- सो, ऐरावत क्षेत्र में भी भरत-क्षेत्र कि तरह एक आर्य-खंड है !

जम्बूद्वीप -> भरत क्षेत्र -> आर्यखण्ड

- भरत-क्षेत्र के छह-खण्डों में 5 मलेच्छ-खंड हैं और 1 आर्यखण्ड

- सिर्फ आर्यखण्ड में ही धर्म-तीर्थ की प्रवृति होती है, इसमें ही जीव मोक्ष का उपाय कर सकते हैं !

- सभी श्लाका-पुरुष(तीर्थंकर, चक्रवर्ती इत्यादि) आर्यखण्ड में ही जन्म लेते हैं !

- बाकी के 5 मलेच्छ खण्डों में धर्म-हीन, धर्म से शून्य मनुष्य हुआ करते हैं

जम्बूद्वीप -> विदेह-क्षेत्र

- भरत और ऐरावत क्षेत्रों में तो केवल एक ही काल में अरहंत भगवान् हुआ करते हैं, किन्तु विदेह-क्षेत्र में तो सदा ही धर्म की धारा बहती रहती है ! विदेह-क्षेत्र में सदैव केवलज्ञानी, तीर्थंकर, और ऋद्धिधारी साधुओं का समागम बना रहता है !

- जम्बू-द्वीप के 6 कुलाचल पर्वतों में नील और निषेध पर्वतों के बीच में स्थित "विदेह-क्षेत्र" है ! और इसका विस्तार 33684 4/19 योजन है !

- विदेह-क्षेत्र के बीचो-बीच सुमेरु-पर्वतराज विराजित है ! सुमेरु-पर्वत के :-
१ - पश्चिम में (पश्चिम-विदेह-क्षेत्र),
और
२ - पूर्व में (पूर्व-विदेह-क्षेत्र)
नामक 2 भाग हो गए हैं !

- पश्चिम विदेह-क्षेत्र में "सीतोदा" तथा पूर्वी-विदेह-क्षेत्र में "सीता" नदी बहती है ! जो पूर्वी और पश्चिमी विदेह-क्षेत्रों को 2-2 भागों में विभक्त करती है !

आगे प्रत्येक भाग में क्रम से 4 वक्षार पर्वत और 3 विभंगा नदियां (पर्वत फिर नदी फिर पर्वत) होने से हर भाग के 8-8 हिस्से हो गए हैं !
और इस तरह से विदेह-क्षेत्र के 8x4= 32 हिस्से हैं, जिन्हे 32 विदेह-देश भी कहते हैं !





अब इन विदेह-देशों में भी हर एक में "भरत-क्षेत्र" की तरह ही विजयार्ध पर्वत और 2 नदियां होने से इनके भरत-क्षेत्र की तरह ही 6-6 खंड हो गए हैं, जिनमे 5 मलेच्छ-खंड हैं और 1 आर्यखण्ड है !

- इन आर्यखण्डों में सदा चौथा-काल(दुषमा-सुषमा) रहता है, यहाँ कभी भी काल-परिवर्तन नहीं होता है !

- विद्यमान तीर्थंकर यहाँ हैं !

- विदेह-क्षेत्र रोग, महामारी, इतियों आदि से रहित है, यहाँ कुदेव-कुलिंगी और कुमति वाले जीव नहीं होते हैं !

- विदेह-क्षेत्र में 2 उत्तम भोग-भूमियां "उत्तरकुरु" व "देवकुरु" भी हैं !

दूसरा द्वीप -> धातकीखंड-द्वीप

- यह मध्य-लोक में दूसरा-द्वीप है, जिसका विस्तार "चार लाख योजन" है !
- इसके नीचे (दक्षिण में) और ऊपर (उत्तर में) लवण-समुद्र और कालोद-समुद्र को स्पर्श करते हुए, 2 " इश्वाकार-पर्वत" हैं ! जिससे धातकीखंड के 2 हिस्से हो जाते हैं !

- अब जो पूर्वधातकीखंड और पश्चिमधातकीखंड हैं ! उनकी रचना "जम्बू-द्वीप" जैसी ही समझनी चाहिए !
जैसे जम्बू-द्वीप में भरत,ऐरावत आदि क्षेत्र हैं, हिमवान्, महाहिमवान् आदि कुलाचल पर्वत हैं, गंगा-सिंधु आदि नदियां है, धातकीखण्ड के दोनों भागों में वैसी ही रचना है !

- पूर्वधातकीखंड के मध्य में या यूँ कहिये कि जम्बू-द्वीप के सुमेरु-पर्वत के सीधे-हाथ(पूर्व) में धातकीखण्ड में "विजय-मेरु" है, और ऐसे ही पश्चिमधातकीखंड में "अचल-मेरु" है !

- दोनों ही धातकीखण्डों में जम्बू-द्वीप कि तरह भरत, हैमवत, हरि, विदेह, रम्यक्, हैरण्यवत और ऐरावत क्षेत्र हैं !
तो इस तरह से धातकीखण्ड में 2 भरत, 2 ऐरावत और बाकी सब 2-2 क्षेत्र हैं !

- धातकीखण्ड को चारों तरफ से घेरे हुए आठ लाख योजन विस्तार वाला "कालोद-समुद्र" है !

तीसरा द्वीप -> पुष्करवर द्वीप

- कालोद-समुद्र को घेरे हुए सोलह लाख योजन विस्तार वाला मध्य-क्षेत्र का तीसरा "पुष्करवर द्वीप" है !
- इसके बिलकुल बीचो-बीच चूड़ी के आकार वाला "मानुषोत्तर पर्वत" है !
- कालोद-समुद्र से मानुषोत्तर पर्वत तक के आधे क्षेत्र को "पुष्करार्द्धद्वीप" कहते हैं !

- इसके अंदर की तरफ भी "धातकीखंड द्वीप" की तरह ही उत्तर और दक्षिण में दो " इश्वाकार-पर्वत" हैं ! जिससे पुष्करार्द्धद्वीप के 2 हिस्से हो जाते हैं !

अब जो पूर्वपुष्करार्द्धद्वीप और पश्चिमपुष्करार्द्धद्वीप हैं ! उनकी रचना हू-ब-हू "धातकीखंड द्वीप" जैसी ही समझनी चाहिए !
तो इस प्रकार पुष्करार्द्धद्वीप में भी धातकीखण्ड की तरह 2 भरत, 2 ऐरावत और बाकी सब 2-2 क्षेत्र हैं !

- पूर्वपुष्करार्द्धद्वीप के मध्य में या यूँ कहिये कि जम्बू-द्वीप के "सुमेरु-पर्वत" और पूर्वधातकीखण्ड के "विजय-मेरु" के सीधे-हाथ(पूर्व) में "मंदर-मेरु" है, और ऐसे ही पश्चिमपुष्करार्द्धद्वीप में "विद्युन्माली-मेरु" हैं !
इन्हे ही "पंच-मेरु" कहते हैं !

- सुमेरुपर्वत 1,00,040 योजन है, बाकी के ये चारों मेरु 85,000 योजन ऊँचे हैं !

अढ़ाई-द्वीप

- जम्बू-द्वीप, लवण-समुद्र, धातकीखंड-द्वीप, कालोद-समुद्र और पुष्करवर-द्वीप का मानुषोत्तर पर्वत तक का आधा भाग (पुष्करार्द्धद्वीप), "अढ़ाई-द्वीप" कहलाता है !

- इसका विस्तार 45 लाख योजन का है !

- मानुषोत्तर पर्वत तक ही मनुष्य जा सकते हैं, या कहिये कि अढ़ाई-द्वीप के आगे मनुष्य नहीं जा सकते ! इसके आगे के असंख्यात द्वीपों में "जघन्य-भोग-भूमि" हैं, जिनमे असंख्यात त्रियंच-युगल रहते हैं !

- इन अढ़ाई-द्वीपों से आगे कोई ऋद्धिधारी या विद्याधर मनुष्य भी नहीं जा सकता !


पंच-मेरु



- जम्बू-द्वीप में 1, धातकीखंड में 2 और पुष्करार्द्धद्वीप में 2 मेरु पर्वत हैं ! इस प्रकार अढ़ाई-द्वीपों में 5 मेरु पर्वत हैं !!!

- पंच-मेरु :-(पश्चिम से पूर्व) ...

१ - "विद्युन्माली-मेरु", (पश्चिमपुष्करार्द्धद्वीप के मध्य में)
२ - "अचल-मेरु", (पश्चिमधातकीखंड के मध्य में)
३ - "सुमेरु-पर्वत", (जम्बू-द्वीप के मध्य में)
४ - "विजय-मेरु", (पूर्वधातकीखंड के मध्य में)
५ - "मंदर-मेरु", (पूर्वपुष्करार्द्धद्वीप के मध्य में)

पांचों मेरु पर्वतों पर कुल 80 अकृत्रिम चैत्यालय हैं !

तीस- चौबीसी

- हम पूजन में "तीस- चौबीसी" का अर्घ्य चढ़ाते हैं, सो, कौनसी हैं वो तीस- चौबीसी ?

इन अढ़ाई द्वीपों के (जम्बू-द्वीप में 1, धातकीखंड में 2 और पुष्करार्द्धद्वीप में 2) :-
१ - पंच भरत
२ - पंच ऐरावत
में भूत-भविष्य और वर्त्तमान की 30 चौबीसी ...

5(भरत) + 5(एरावत) = 10
10 x 3(भू,भवि,वर्त) = 30

एक चौबीसी में 24 तीर्थंकर भगवान्

30 चौबीसी में कुल 30x24 = 720 तीर्थंकर भगवानों को अर्घ्य चढ़ाते हैं !

पंच-मेरु - सुमेरु-पर्वत



- हमने पढ़ा कि, मध्य-लोक के बिल्कुल बींचो-बीच स्थित जम्बू-द्वीप के विदेह क्षेत्र में बिलकुल बीचो-बीच एक लाख चालीस (1,00,040 योजन) ऊँचा "सुमेरु-पर्वतराज" शोभायमान है !

- सुमेरु-पर्वत :-
भूमि के अंदर (नींव) 1,000 योजन
भूमि के ऊपर 99,000 योजन
और अंत में 40 योजन ऊँची चूलिका (चोटी) जाननी चाहिए !
- नींव के बाद, पृथ्वी के तल पर इसका विस्तार 10,000 योजन का है ! जो की नीचे से ऊपर चोटी तक पहुँचते पहुँचते 4 योजन का रह जाता है !

- सुमेरु-पर्वतराज पर चार वन हैं !
१ - भद्रसाल वन :- पृथ्वी तल पर है !
२ - नंदन वन :- 500 योजन ऊंचाई पर है !
३ - सोमनस वन :- नंदन वन से 62,500 योजन ऊपर !
४ - पाण्डुक वन :- सोमनस वन से 36,000 योजन ऊपर जाकर !

प्रत्येक वन के चारों दिशाओं में एक-एक चैत्यालय है ! सो, इस तरह सुमेरु पर्वत पर 4x4 = 16 अकृत्रिम चैत्यालय,
और
पांचों मेरु पर्वतों पर कुल 80 अकृत्रिम चैत्यालय हैं !

आंठवा द्वीप - नंदीश्वर द्वीप


- इसका विस्तार 163 करोड़ 84 योजन है !
- यह मध्य लोक का आंठवा-द्वीप है !
- नंदीश्वर द्वीप पर 52 अकृत्रिम जिनालय हैं !
- हर जिनालय में 108-108 रत्न व स्वर्णमयी 500 धनुष ऊँची अनादि-निधन पद्मासन मुद्रा में 5616 भव्य-प्रतिमाएं विराजमान हैं !

- "अष्टानिका पर्व" मे "नंदीश्वर द्वीप" के विशेष महत्व है !

- अष्टानिका पर्व अर्थात कार्तिक, फाल्गुन और आषाढ़ महीनो के अंतिम आठ दिनों में (अष्ठमी से पूर्णिमा तक) सौधर्म आदि इंद्र व देवता भक्ति भाव से आठ दिनों तक अखंड रूप से पूजा करते हैं !

लेकिन, क्यूंकि मनुष्य नंदीश्वर द्वीप तक नहीं जा सकते इसलिए वह अपने अपने मंदिरों में ही नंदीश्वर द्वीप की रचना करके पूजा करते हैं !

मध्य-लोक सम्बन्धी कुछ प्रश्न

उर्ध्व लोक को पढ़ने से पहले मध्य-लोक के सम्बन्ध में आये कुछ प्रश्नों के उत्तरों को मालूम कर लेना चाहिए !

प्र १ :- मध्य-लोक में हम आज कहाँ रहते हैं ?
उ :- पहले द्वीप "जम्बू-द्वीप" के दक्षिणी भाग में स्थित "भरत-क्षेत्र" के आर्यखण्ड में भारत-वर्ष हमे अपना निवास समझना चाहिए !
भरत-क्षेत्र के आर्यखण्ड के मध्य में स्थित "अयोध्या-नगरी" है जिसके :-
- 1,000 योजन (40 लाख मील) पश्चिम में सिंधु-नदी और पूर्व में गंगा नदी बहते हुए नीचे दक्षिण में जा कर लवण समुद्र में मिलती हैं !!!
- अयोध्या के नीचे दक्षिण में लगभग 119 योजन (4,76,000 मील) दूर लवण समुद्र है और ऊपर इतनी ही दूरी पर विजयार्ध पर्वत है !
यह भी समझना चाहिए कि जिसे विज्ञान अर्थ(earth) के रूप में विश्व मानता है वह उस पृथ्वी का diameter 7 926.3352 miles बताता है, जब कि हमने पढ़ा था कि :
भरत-क्षेत्र का विस्तार जम्बू-द्वीप का 1/190वाँ , याने 1,00,000/190 या 526 6/19 योजन है ! याने 2,10,5263 २/३ मील है ! इसका मतलब कि आर्यखण्ड का बहुत सारा क्षेत्र आज भी विज्ञानियों के ज्ञान के परे है !
वर्त्तमान में जो गंगा-सिंधु नदियां हमे नज़र आती हैं, हिमालय इत्यादि पर्वत जो दिखते हैं, सब कृत्रिम हैं ! अकृत्रिम नदी, समुद्र और पर्वतों के ये सब उपनदी, उपसमुद्र, उपपर्वत मानने चाहिए !

प्र २ :- मनुष्य लोक का विस्तार 45 लाख योजन कैसे ?
उ :- हमने पढ़ा था कि :-
मध्य लोक के बिल्कुल बीचों-बीच थाली के आकार का 1,00,000 योजन विस्तार वाला पहला द्वीप "जम्बू-द्वीप" है !
इसके बाद इसे चारों तरफ से घेरे हुए चूड़ी के आकार वाला पहला समुद्र लवण-समुद्र है, जो कि इस(जम्बू-द्वीप) से दूने विस्तार वाला है ! आगे इन द्वीपों और समुद्रों का विस्तार आगे आगे दोगुना होता चला गया है !

तो अढ़ाई-द्वीप में:-
1 - जम्बूद्वीप एक लाख योजन
2 - लवणसमुद्र दो लाख योजन
3 - घातकीखंड द्वीप चार लाख योजन
4 - कालोद समुद्र आठ लाख योजन
5 - पुष्करवर द्वीप सोलह लाख योजन (इसका आधा याने आठ योजन लेना है, क्यूंकि मानुषोत्तर पर्वत इसके आधे हिस्से में है)
अब इन्हे जोड़ने पर
8 + 8 + 4 + 2 + 1 = 23 लाख योजन, फिर 45 लाख योजन कैसे बतलाया ???

नोट :- विस्तार का मतलब होता है कि एक छोर से दूसरे छोर तक जाना !
तो चलिए फिर पूर्वपुष्करार्द्धद्वीप के मानुषोत्तर पर्वत से शुरू करते हैं, सबका विस्तार जोड़ते हुए, पश्चिमपुष्करार्द्धद्वीप के मानुषोत्तर पर्वत तक पहुँचने में
8 + 8 + 4 + 2 + 1 + 2 + 4 + 8 + 8 = 45 लाख योजन ( मानुषोत्तर पर्वत का विस्तार)

प्र ३ :- अढ़ाई द्वीप के बाहर भूमियों की कैसी स्थिति है ?
उ :- अढ़ाई द्वीप के बाहर बीच में असंख्यात समुद्रों और द्वीपों में जघन्य भोग-भूमि की रचना है !
और जैसे पुष्करवर द्वीप में मानुषोत्तर पर्वत है वैसे ही अंतिम स्वयंभूरमण द्वीप के बीच में नागेन्द्र/स्वयंप्रभ नामका पर्वत है जिसके पार फिर स्वयंभूरमण द्वीप और स्वयंभूरमण-समुद्र में "कर्म-भूमि" है ... वहाँ विदेह क्षेत्र की तरह सदा चौथा काल और कर्मभूमि बनी रहती है, किन्तु विशेष बात ये है "की वहाँ मनुष्य नहीं पाये जाते" सिर्फ त्रस-जीव पाये जाते हैं !
और अंत में

प्र :- ये सब भूगोल हम क्यूँ पढ़ें ? ये ज़रूरी है ?
उ :- ज़रूरी होता नहीं अगर तो क्यूँ महान आचार्य इन महान ग्रंथों की रचना करते ?
इसकी उपयोगिता है, इसीलिए तो चार अनुयोगों में से एक करणानुयोग कहा है !
12 भावना में लोक-भावना भाने के लिए लोक का अल्प-ज्ञान होना तो आवश्यक लगता ही है !

उर्ध्व-लोक

- मध्य-लोक के ऊपर लोक के अंत तक उर्ध्व-लोक है !
- मध्य-लोक में शोभायमान "सुमेरु-पर्वत" की चूलिका (चोटी) से "एक बाल" के अंतर/फासले से शुरू होकर लोक के अंत तक के भाग को "उर्ध्व-लोक" कहा है !
सो, भूमितल से 99,040 योजन ऊपर जाने पर उर्ध्व लोक शुरू होता है !

उर्ध्व-लोक का आकार ढोलक जैसा है !
इसकी :-
ऊंचाई - 1,00,040 योजन कम 7 राजू है !
मोटाई - 7 राजू
और
चौड़ाई - नीचे 1 राजू, बीच में 5 और ऊपर 1 राजू है !

- उर्ध्व लोक में "वैमानिक-देवों" के आवास हैं !

अब उमास्वामी जी ने तत्वार्थसूत्रजी में (अध्याय 4 - सूत्र 17) वैमानिक देवों के 2 भेद बतलाये हैं :-
१ - कल्पोपपन्न(कल्पवासी),
२ - कल्पातीत

- जहाँ इंद्र आदि दस भेदों की कल्पना होती है, उन "सोलह स्वर्गों" में जन्म लेने वाले देवों को "कल्पवासी देव" कहते हैं !
- जहाँ इंद्र आदि दस भेदों की कल्पना नहीं होती, सोलह स्वर्गों से ऊपर उन 9 ग्रैवेयक, 9 अनुदिश, 5 अनुत्तर में जन्म लेने वालों को "कल्पातीत देव" कहते हैं ! इन्हे "अहमिन्द्र" भी कहा है !

सोलह-स्वर्ग

ऊपर आमने-सामने 8 युगल/जोड़े के रूप में 16 स्वर्ग, फिर 9 ग्रैवेयक, 9 अनुदिश और 5 अनुत्तर क्रम से आगे-आगे हैं !
सौधर्म - ऐशान - सुमेरु-पर्वत के तल से डेढ़-राजू में
सानतकुमार-माहेन्द्र - उसके ऊपर डेढ़-राजू में
ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर - १/२ राजू में
लानत्व-कापिष्ट - १/२ राजू में
शुक्र-महाशुक्र - १/२ राजू में
सतार-सहस्त्रार - १/२ राजू में
आनत-प्राणत - १/२ राजू में
आरण-अच्युत - १/२ राजू में

इस प्रकार :-
1१/२(डेढ़) + 1१/२(डेढ़) = 3 राजू
१/२ x 6 = 3 राजू में
3 + 3 = 6 राजू में 16 स्वर्ग हैं !

उसके आगे लोक के अंत तक 1 राजू में 9 ग्रैवेयक, 9 अनुदिश और 5 अनुत्तर और सिद्ध-शिला हैं !
इस तरह उर्ध्व-लोक की ऊंचाई "1,00,040 योजन कम 7 राजू है" !

सिद्ध-शिला

- अंतिम अनुत्तर विमान "सर्वार्थ-सिद्धि" के ध्वज-दंड से 12 योजन ऊपर जाकर :-
1 राजू चौड़ी,
7 राजू लम्बी
और
8 योजन ऊँची,
आंठवी पृथ्वी है !

- इसके ठीक बीच में चांदी एवं सोने के समान तथा नाना रत्नों से परिपूर्ण, "ईषत्प्रागभार" नामक क्षेत्र है !
यही "सिद्ध-शिला" है !
- इसका आकार उल्टे रखे हुए कटोरे या छत्र के जैसा है ! - विस्तार 45 लाख योजन है !
- सिद्ध-शिला की मोटाई बीच में 8 योजन की है जो दोनों सिरों तक घटते-घटते "एक अंगुल" मात्र की रह जाती है !

ऊपर बताई आंठवी पृथ्वी के ऊपर तीनों वातवलय (धनोदधि वातवलय,धन वातवलय और तनु वातवलय) हैं, जिनकी कुल मोटाई कुछ कम 1 योजन या लगभग 7,575 धनुष की है !
इसमें से अंतिम तनु वातवलय के 525 धनुष प्रमाण क्षेत्र में ही "सिद्ध-लोक" हैं, इसी में अनन्तानत सिद्ध भगवान् विराजमान हैं !

- एक-एक सिद्ध आत्मा के अंदर अनन्तों सिद्ध आत्माएं विराजमान हैं !
यही लोक का अंत है !
इसी के साथ लोक विषय का भी अंत हुआ !

लोक - जानने योग्य कुछ अन्य बातें ...

- हमने पढ़ा था कि कर्म-भूमियों के आर्यखण्ड में ही तीर्थंकर होते हैं !
विदेह-क्षेत्रों के 32x5=160 और बाकी 5 भरत, 5 ऐरावत जोड़ कर अढ़ाई-द्वीप में कुल 170 कर्म-भूमियाँ हैं !
सो, एक समय में होने वाले तीर्थंकरों कि अधिकतम संख्या 170 है !
-ऐसा कहा जाता है कि "भगवान् श्री अजितनाथ जी" के समय में 170 तीर्थंकर हुए थे !
- अधोलोक के खर और पंक भाग में भवनवासी और व्यंतर देवों के असंख्यात भवन हैं,
मध्य लोक में भी व्यंतर और ज्योतिष देवों के असंख्यात भवन हैं, प्रत्येक में एक-एक अकृत्रिम चैत्यालय है ! इनकी संख्या असंख्यात है !
लेकिन जिन अकृत्रिम चैत्यालयों कि गिनती कि जाती है उनकी संख्या 8,56,97,481 है ! जिसमे से 458 मध्य-लोक में हैं !
- पहला लवण-समुद्र, दूसरा कालोद इस क्रम में पांचवां समुद्र "क्षीरसागर" है ! तीर्थंकरों के जन्माभिषेक के लिए देवगण इसी सागर से स्वच्छ जल लेकर आते हैं !
- लोक के मध्य में 3,21,62,249 २/३ धनुष कम 13 राजू इस त्रस-नाली की ऊंचाई कही है ! जिसके बाहर त्रस-जीवों नहीं पाये जाते !
- 14 राजू ऊँचे लोक में 7 राजू अधोलोक कहा, 7 राजू उर्ध्वलोक कहा है ! मध्य-लोक को उर्ध्व लोक का ही निचला हिस्सा कहीं कहीं माना गया है, क्यूंकि राजू कि तुलना में कुछ लाख योजन कुछ भी नहीं !
- सिद्ध-शिला से 7,050 धनुष ऊपर तनुवातवलय के अंतिम 525 धनुष प्रमाण क्षेत्र में सिद्ध-लोक कहा है, जिसमें सिद्ध भगवान् विराजमान हैं !
- अंत में लोक को पढ़ने के बाद यही भाव आना चाहिए कि अब तक अज्ञानवश मैं इस लोक के हर क्षेत्र में(संसार-रूप क्षेत्र) अनन्तों बार जन्म ले कर मर चुका ... अब इस संसार चक्र से मुक्ति मिले उसके लिए प्रयत्न करना चाहिए ।

- पढ़ने और जानने के लिए पूरा ज्ञान का सागर है ... करणानुयोग के प्रमुख शास्त्र तिलोयपण्णत्ति, त्रिलोकसार, जम्बूद्वीपपण्णत्ति जैसे शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिए !

बाकी विषयों के लिए पढ़ते रहिये "जैनसार, जैन धर्म का सार ... "

--- ---